शिमला:
हिमाचल प्रदेश में पशुओं में फैलने वाली संक्रामक बीमारी 'लंपी वायरस' का प्रकोप लगातार पैर पसार रहा है। प्रदेश भर में अब तक करीब 2,500 पशु इस खतरनाक वायरस की चपेट में आ चुके हैं, जबकि 90 पशु अपनी जान गंवा चुके हैं।
बीमारी का सबसे भयानक रूप सिरमौर और ऊना जिलों में देखने को मिल रहा है। इसके अलावा सोलन, बिलासपुर, हमीरपुर और मंडी में भी रोजाना नए मामले सामने आ रहे हैं।
जिलेवार स्थिति: सिरमौर में सबसे ज्यादा 2,064 गोवंश संक्रमित
राज्य में लंपी का सबसे बड़ा केंद्र सिरमौर जिला बना हुआ है।
सिरमौर: यहां अब तक 2,064 गोवंश संक्रमित पाए गए हैं और 47 पशुओं की मौत हो चुकी है।
ऊना: ऊना में 438 पशु संक्रमित हुए हैं, जिनमें से 257 ठीक हो चुके हैं जबकि 21 की मौत दर्ज की गई है।
बिलासपुर: यहां 169 पशु संक्रमित मिले, जिनमें 94 स्वस्थ हुए और 8 की जान गई।
मंडी व चंबा: मंडी में 55 पशु संक्रमित हैं और 1 की मौत हुई है, जबकि चंबा में 3 पशुओं की मौत की सूचना है।
पशुपालन विभाग के अनुसार, जर्सी गाय, बैल और बछड़ों में लंपी का असर सबसे ज्यादा देखा जा रहा है, जबकि देसी व स्थानीय नस्ल के पशुओं में इसका असर अपेक्षाकृत कम है। बीमारी की पुख्ता पुष्टि के लिए संदिग्ध पशुओं के नमूने 'राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान, भोपाल' भेजे जा रहे हैं।
बढ़ते मामलों को देखते हुए पशुपालन विभाग की टीमें गांव-गांव जाकर पशुओं का इलाज और टीकाकरण कर रही हैं। अब तक प्रदेश में 10,382 पशुओं को लंपी से बचाव का टीका लगाया जा चुका है।
निदेशक की अपील: खुद इलाज न करें, डॉक्टर से संपर्क करें
पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. संजीव कुमार धीमान ने पशुपालकों से अपील की है कि वे टीकाकरण अभियान में सहयोग दें। उन्होंने कहा, "पशु के शरीर में गांठें या बुखार दिखने पर खुद इलाज करने की जगह तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सक से संपर्क करें। समय पर पहचान और उपचार से ही पशुओं की जान बचाई जा सकती है।"
क्या है लंपी रोग और इसके लक्षण?
लंपी त्वचा रोग (Lumpy Skin Disease) एक वायरल बीमारी है। इसमें पशु की चमड़ी के नीचे छोटी-बड़ी गांठें बन जाती हैं। इसके साथ ही पशु को तेज बुखार, कमजोरी, नाद से पानी बहना और चारा न खाने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
बचाव और सावधानी के मुख्य उपाय:
तत्काल संपर्क: पशु में गांठ या बुखार दिखते ही पशु चिकित्सक को सूचित करें।
आइसोलेशन: संक्रमित पशु को स्वस्थ पशुओं के झुंड से तुरंत अलग बांधें।
सफाई: पशुशाला (गौशाला) की नियमित सफाई और कीटाणुशोधन (डिसइंफेक्शन) करें।
टीकाकरण: विभाग की टीमों से अपने स्वस्थ पशुओं का समय पर टीकाकरण करवाएं।
परहेज: बीमार या संदिग्ध पशु को दूसरे पशुओं के संपर्क में आने से रोकें और घरेलू नुस्खों से खुद इलाज करने से बचें।