अदालत ने कहा- कानून लागू कराने वाले कर्मचारी गंभीर अपराध में दोषी पाए जाएं तो सेवा में बनाए रखना उचित नहीं; डीजीपी की कार्रवाई को माना वैध
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए पुलिस विभाग के दो कांस्टेबलों को सेवा से बर्खास्त करने के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने दोनों पुलिस कर्मचारियों की ओर से बर्खास्तगी के खिलाफ दायर याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि कानून लागू कराने वाले कर्मचारी यदि स्वयं गंभीर अपराध में दोषी पाए जाते हैं
तो उन्हें सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है।
न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं गौरव वर्मा और अक्षय चौहान की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) द्वारा संविधान के अनुच्छेद 311(2)(ए) के तहत बिना विभागीय जांच के की गई बर्खास्तगी की कार्रवाई को वैध माना।
गंभीर अपराध में दोषी पुलिस कर्मियों को सेवा में रखना उचित नहीं
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जिन पुलिस कर्मचारियों की जिम्मेदारी एनडीपीएस मामलों की जांच करना और अपराधियों को कानून के दायरे में लाना थी, वही यदि ऐसे अपराधों में दोषी पाए जाते हैं तो यह गंभीर स्थिति है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में बर्खास्तगी की सजा को अत्यधिक या असंगत नहीं माना जा सकता। पुलिस विभाग में अनुशासन और जनता के विश्वास को बनाए रखना बेहद जरूरी है।
दोनों कांस्टेबलों पर एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज हुए थे मामले
पहले मामले में याचिकाकर्ता गौरव वर्मा वर्ष 2009 में कांस्टेबल पद पर नियुक्त हुए थे। वर्ष 2016 में मंडी जिले के थाना बल्ह में उनके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा-20 के तहत मामला दर्ज हुआ था। मामले में 1,003 ग्राम चरस बरामदगी का आरोप था।
ट्रायल कोर्ट के स्पेशल जज मंडी ने उन्हें दोषी ठहराते हुए तीन वर्ष की सजा और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
वहीं, दूसरे मामले में याचिकाकर्ता अक्षय चौहान वर्ष 2015 में खेल कोटे के तहत कांस्टेबल नियुक्त हुए थे। वर्ष 2019 में थाना भुंतर में एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ। स्पेशल जज-II रामपुर बुशहर की अदालत ने उन्हें 26 दिसंबर 2023 को दोषी करार दिया था।
सजा निलंबन से दोषसिद्धि खत्म नहीं होती: हाईकोर्ट
दोनों याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि उनकी आपराधिक अपील हाईकोर्ट में लंबित है और उनकी सजा निलंबित की जा चुकी है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि डीजीपी अनुशासनात्मक प्राधिकारी नहीं हैं।
राज्य सरकार ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 311(2)(ए) आपराधिक मामले में दोषसिद्धि होने पर सक्षम प्राधिकारी को बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी का अधिकार देता है।
हाईकोर्ट ने माना कि आपराधिक अपील में केवल सजा को निलंबित किया गया था, दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई गई थी। जब तक अपीलीय अदालत दोषसिद्धि को रद्द नहीं करती, तब तक बर्खास्तगी आदेश प्रभावी और वैध रहेगा।
पालमपुर कारोबारी निशांत की पुनर्विचार याचिका खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पालमपुर के कारोबारी निशांत की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया है। न्यायमूर्ति सुशील कुकरेजा और न्यायमूर्ति वीरेंद्र सिंह की पीठ ने कहा कि 29 अप्रैल को पारित आदेश में कोई स्पष्ट त्रुटि नहीं है।
अदालत ने कहा कि पुनर्विचार याचिका केवल रिकॉर्ड पर मौजूद प्रत्यक्ष गलती को सुधारने के लिए होती है। इसका उपयोग किसी फैसले के खिलाफ अपील की तरह नहीं किया जा सकता।
पीठ ने याचिका को निराधार मानते हुए 10 हजार रुपये खर्च के साथ खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता द्वारा लगाए गए कुछ आरोप मुख्य मामले से संबंधित नहीं थे और अनावश्यक विवाद पैदा कर रहे थे।
गगल हवाई अड्डा विस्तार मामले में फैसला सुरक्षित
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कांगड़ा के गगल हवाई अड्डा विस्तार मामले में सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस मामले की सुनवाई अब तक करीब 92 बार अदालत में हो चुकी है।
न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ मामले की सुनवाई कर रही है।
भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) ने गगल हवाई अड्डे के विस्तार की योजना दो चरणों में तैयार की है। याचिका में क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, भूस्खलन, बाढ़ और भूकंप संभावित क्षेत्र होने को लेकर चिंताएं जताई गई हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि हवाई अड्डा विस्तार के लिए आवश्यक अनुमतियां पूरी तरह प्राप्त नहीं की गई हैं। वहीं, राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी है और कुछ मामलों में भूमि अधिग्रहण कलेक्टर द्वारा अवार्ड भी पारित किए जा चुके हैं।
follow us on facebook
subscribe to us on youtube