पीएफ-ईएसआई को 15 हजार रुपये के वेतन में शामिल नहीं कर सकती कंपनी, जीवीके को दो महीने में बकाया भुगतान के निर्देश
हिमाचल प्रदेश में 108 और 102 नेशनल एंबुलेंस सर्विस के चालकों और इमरजेंसी मेडिकल टेक्नीशियनों (ईएमटी) के लिए राहत की खबर है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि टेक होम सैलरी का मतलब कर्मचारी के खाते में आने वाली वास्तविक नकद राशि है।
इसमें भविष्य निधि (पीएफ) और कर्मचारी राज्य बीमा (ईएसआई) जैसी वैधानिक कटौतियों को शामिल नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने पूर्ण चंद की ओर से दायर निष्पादन याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया।
15 हजार रुपये के वेतन में नहीं चलेगी कंपनी की मनमानी
अदालत ने जीवीके इमरजेंसी मैनेजमेंट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि टेक होम सैलरी वह वास्तविक खर्च करने योग्य राशि है, जो सभी करों और वैधानिक कटौतियों के बाद कर्मचारी के बैंक खाते में जमा होती है।
पीएफ और ईएसआई का भुगतान करना कंपनी की वैधानिक जिम्मेदारी है। इसे कर्मचारी की इन-हैंड सैलरी का हिस्सा बताकर 15 हजार रुपये के भीतर समायोजित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया है कि वह प्रत्येक पात्र कर्मचारी को 20 जनवरी 2020 से 30 जनवरी 2021 तक 15 हजार रुपये प्रति माह की पूरी टेक होम सैलरी का भुगतान सुनिश्चित करे। यह अवधि सक्षम प्राधिकारी द्वारा विवाद का निपटारा किए जाने की तिथि तक लागू होगी। अदालत ने बकाया राशि के भुगतान के लिए कंपनी को दो महीने का समय दिया है।
कर्मचारियों के हाथ में आ रहे थे 11,545 से 12,908 रुपये
मामला उस समय का है, जब हाईकोर्ट ने 8 जनवरी 2020 को आदेश जारी कर जीवीके कंपनी को विवाद का समाधान होने तक प्रत्येक पायलट और ईएमटी का टेक होम वेतन बढ़ाकर 15 हजार रुपये प्रति माह करने का निर्देश दिया था। यह आदेश 20 जनवरी 2020 से प्रभावी होना था।
हालांकि, कंपनी ने 15 हजार रुपये की राशि को कॉस्ट टू कंपनी मान लिया। इसके तहत पीएफ, ईएसआई और ग्रेच्युटी जैसी मदों को भी इसी राशि के भीतर शामिल कर दिया गया। इसके चलते कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वास्तविक वेतन घटकर करीब 11,545 से 12,908 रुपये रह गया।
कर्मचारियों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि उन्हें 15 हजार रुपये की पूरी इन-हैंड सैलरी दी जाए।
लंबे संघर्ष के बाद मिली राहत
कर्मचारियों की ओर से दायर निष्पादन याचिका में अदालत से अपने पूर्व आदेश का पालन करवाने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने कर्मचारियों की दलील स्वीकार करते हुए कंपनी की व्याख्या को गलत ठहराया। इस फैसले से प्रदेश के सैकड़ों एंबुलेंस चालकों और तकनीकी स्टाफ को राहत मिली है।
ये कर्मचारी लंबे समय से अपने पूर्ण मानदेय के लिए संघर्ष कर रहे थे। अब कंपनी को हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार पात्र कर्मचारियों को बकाया वेतन का भुगतान करना होगा।
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