हिमाचल प्रदेश के किशोरों को लेकर किए गए एक अध्ययन में चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। शोध के अनुसार, प्रदेश के 15.6 प्रतिशत विद्यार्थी बुलिंग (साथियों द्वारा बार-बार परेशान करना) का शिकार पाए गए, जबकि 18.41 प्रतिशत किशोर किसी न किसी रूप में बुलिंग की घटनाओं में शामिल मिले।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि माता-पिता के साथ मजबूत भावनात्मक संबंध और अच्छे मित्र समूह बच्चों को बुलिंग से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन बच्चों को परिवार का भरोसा और दोस्तों का सहयोग मिलता है, उनमें बुलिंग का शिकार बनने या दूसरों को परेशान करने की संभावना कम पाई गई।
यह शोध ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट फॉर मदर एंड चाइल्ड, नई दिल्ली के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका पीएलओएस वन में प्रकाशित हुए हैं।
7563 विद्यार्थियों पर किया गया अध्ययन
शोध के लिए नवंबर-दिसंबर 2023 के दौरान हिमाचल प्रदेश के सभी जिलों के 204 सरकारी स्कूलों में 13 से 17 वर्ष आयु वर्ग के 7563 विद्यार्थियों से मानकीकृत प्रश्नावली के माध्यम से जानकारी जुटाई गई।
शोध में पाया गया कि जिन बच्चों का माता-पिता के साथ बेहतर संवाद और भावनात्मक जुड़ाव था, उनमें बुलिंग का खतरा कम रहा।
लड़के बुलिंग में अधिक प्रभावित
अध्ययन के अनुसार, लड़के बुलिंग का शिकार बनने के साथ-साथ बुलिंग करने वालों में भी अधिक संख्या में पाए गए।
रिपोर्ट में सामने आया कि लड़कों में लड़कियों की तुलना में:
शारीरिक बुलिंग का शिकार बनने की संभावना 1.91 गुना अधिक रही।
साइबर बुलिंग का शिकार बनने की संभावना 1.41 गुना अधिक पाई गई।
शारीरिक बुलिंग करने की संभावना 1.57 गुना अधिक रही।
साइबर बुलिंग करने की संभावना 1.63 गुना अधिक दर्ज की गई।
शोध में यह भी पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों के किशोरों में बुलिंग का जोखिम अधिक था।
शोधकर्ताओं ने दिए ये सुझाव
शोधकर्ताओं ने बच्चों को बुलिंग से बचाने के लिए कई सुझाव दिए हैं:
माता-पिता और बच्चों के बीच नियमित संवाद बढ़ाया जाए।
स्कूलों में प्रभावी एंटी-बुलिंग नीति लागू की जाए।
मानसिक स्वास्थ्य और काउंसलिंग सेवाओं को मजबूत किया जाए।
आयुष्मान भारत स्कूल हेल्थ एंड वेलनेस कार्यक्रम को बेहतर बनाया जाए।
ज्यादा स्क्रीन टाइम, जंक फूड और अस्वस्थ आदतों को कम करने पर ध्यान दिया जाए।
मानसिक तनाव से जुड़ी हो सकती हैं स्वास्थ्य समस्याएं
विशेषज्ञों के अनुसार, बुलिंग का शिकार बच्चे कई बार सिरदर्द, पेट दर्द, नींद की कमी, भूख कम लगना और बार-बार बीमार पड़ने जैसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंचते हैं। कई मामलों में जांच सामान्य आती है, लेकिन इन समस्याओं के पीछे मानसिक तनाव कारण हो सकता है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकुर धर्माणी ने कहा कि बच्चों के बीच होने वाला मजाक कई बार बुलिंग का रूप ले सकता है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
मनोवैज्ञानिक डॉ. दीपा राठौर ने कहा कि माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के लिए सुरक्षित संवाद का माहौल बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वस्थ दोस्ती में सहानुभूति, सम्मान और एक-दूसरे की सीमाओं का ध्यान रखना जरूरी है।
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