शिमला I
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बेटियों के हक में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की उस नीति को सिरे से खारिज कर दिया है, जो शादीशुदा बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) से वंचित करती है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी बेटी ने आवेदन के समय अविवाहित होने की शर्त पूरी की है, तो नियुक्ति मिलने तक उसके विवाह कर लेने से उसकी पात्रता खत्म नहीं होगी।
याचिकाकर्ता श्यामा कुमारी ने अपने पिता की मृत्यु के बाद जून 2021 में अनुकंपा के आधार पर चपरासी के पद के लिए आवेदन किया था। उस समय वह अविवाहित थीं। आवेदन करने के अगले ही महीने यानी 25 जुलाई 2021 को उनका विवाह हो गया।
जब अगस्त 2022 में उन्हें नियुक्ति पत्र मिला और उन्होंने सितंबर 2022 में ज्वाइनिंग दी, तो विभाग ने बाद में उनकी नियुक्ति को यह कहकर रद्द कर दिया कि उन्होंने ज्वाइनिंग के समय अपनी वैवाहिक स्थिति छिपाई। विभाग का तर्क था कि नियुक्ति की शर्त के अनुसार ज्वाइनिंग के समय उम्मीदवार का अविवाहित होना अनिवार्य था।
न्यायालय ने विभाग की कार्रवाई को "परिस्थितियों का शिकार बनाना" करार दिया और निम्नलिखित अहम कानूनी बिंदु स्पष्ट किए कोर्ट ने कहा कि यदि कोई बेटी अविवाहित रहते हुए आवेदन करती है, तो नियुक्ति की पेशकश के समय तक उसे अविवाहित ही माना जाएगा, चाहे उसने इस बीच विवाह कर लिया हो।
अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी बेटी से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अनुकंपा नियुक्ति के निर्णय के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा करे और इस बीच विवाह न करे। वैवाहिक स्थिति का प्रमाणपत्र उस तिथि से संबंधित माना जाना चाहिए जब पद के लिए आवेदन किया गया था, न कि उस दिन का जब नियुक्ति दी जा रही है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग को कड़े निर्देश जारी किए हैं श्यामा कुमारी को 31 अगस्त 2022 के नियुक्ति पत्र के आधार पर उनकी ज्वाइनिंग तिथि से ही दैनिक वेतनभोगी चपरासी के रूप में नियुक्त माना जाए।
उन्हें सभी परिणामी लाभ (Consequential Benefits), वरिष्ठता (Seniority) और मौद्रिक लाभ तुरंत प्रदान किए जाएं। कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को विभाग द्वारा बेवजह परेशान किया गया है, इसलिए वह सभी हक पाने की पात्र हैं।
यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो अनुकंपा नियुक्ति की लंबी प्रक्रिया के दौरान वैवाहिक स्थिति बदलने के कारण कानूनी अड़चनों का सामना कर रही थीं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि शादी किसी बेटी की योग्यता या उसके अधिकारों में बाधक नहीं बन सकती।