हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने वर्ष 2010 में नियुक्त डीम्ड अनुबंध लेक्चररों के नियमितीकरण की तिथि से जुड़े 4 अक्टूबर 2024 के एकल पीठ के फैसले के संचालन और क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने यह राहत प्रथम दृष्टया मामले को विचारणीय मानते हुए प्रदान की।
वरिष्ठता विवाद में पैरा शिक्षकों को मिली अपील की अनुमति
खंडपीठ ने वर्ष 2004 की पैरा नीति के तहत नियुक्त सीएंडवी अनुबंध कर्मचारियों को इस मामले में लेटर पेटेंट अपील (एलपीए) दायर करने की अनुमति दी। साथ ही अपील दाखिल करने में हुई एक वर्ष 286 दिनों की देरी को भी माफ कर दिया।
आवेदकों निर्मल सिंह और अन्य की ओर से अदालत को बताया गया कि वे मूल याचिका अजय कुमार ठाकुर एवं अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य में पक्षकार नहीं थे। उन्हें इस आदेश की जानकारी तब मिली, जब 4 जुलाई 2026 के सरकारी पत्र के आधार पर वरिष्ठता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई।
2004 और 2010 बैच की वरिष्ठता पर विवाद
मामले का मुख्य विवाद वर्ष 2004 में पैरा नीति के तहत नियुक्त शिक्षकों और वर्ष 2010 में चयन बोर्ड के माध्यम से नियुक्त लेक्चररों की वरिष्ठता को लेकर है।
आवेदकों का कहना है कि वे वर्ष 2004 में अनुबंध पर नियुक्त होकर बाद में नियमित हुए, जबकि मूल याचिकाकर्ता वर्ष 2010 में अनुबंध पर नियुक्त हुए और वर्ष 2017 में नियमित किए गए। ऐसे में नियुक्ति वर्ष के आधार पर वर्ष 2004 के कर्मचारियों को वरिष्ठता सूची में प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
आवेदकों ने आरोप लगाया कि एकल पीठ के फैसले और उसके बाद शुरू हुई वरिष्ठता पुनरीक्षण प्रक्रिया से उनके सेवा अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
पहले से लंबित एलपीए के साथ होगी सुनवाई
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि नई एलपीए की सुनवाई पहले से लंबित एलपीए-761/2025 के साथ की जाएगी। इस मामले में 28 अक्टूबर 2025 को भी इसी प्रकार का अंतरिम आदेश पारित किया गया था। अदालत ने राज्य सरकार और अन्य निजी प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।
खुली जेलों के प्रबंधन के लिए राज्य निगरानी समिति का गठन
इसी दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश में खुली जेलों (ओपन करेक्शनल इंस्टीट्यूशंस) की स्थापना, पारदर्शी संचालन और विस्तार की निगरानी के लिए राज्य स्तरीय निगरानी व्यवस्था को लेकर भी महत्वपूर्ण आदेश जारी किए।
यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट द्वारा 26 फरवरी 2026 को सुहास चकमा बनाम भारत सरकार मामले में दिए गए निर्णय के अनुपालन में की गई है।
समिति की जिम्मेदारियां
अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य निगरानी समिति में राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष अध्यक्ष होंगे। गृह सचिव और जेल विभाग के डीआईजी रैंक या उससे ऊपर के वरिष्ठ अधिकारी इसके सदस्य होंगे।
समिति की प्रमुख जिम्मेदारियां होंगी—
खुली जेलों के लिए पात्र कैदियों की पहचान करना।
योग्य कैदियों को सामान्य जेलों से खुली जेलों में स्थानांतरित करना।
खुली जेलों के संचालन, उपयोग और विस्तार की निगरानी करना।
प्रशासनिक बाधाओं को दूर कर योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा करना।
हर तीन महीने में देनी होगी रिपोर्ट
हाईकोर्ट ने समिति को निर्देश दिया है कि गठन के बाद हर तीन महीने में स्टेटस रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाए। पहली रिपोर्ट 21 अगस्त 2026 तक प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल वार्षिक समेकित रिपोर्ट तैयार करेंगे।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि 25 मार्च 2026 की अधिसूचना के तहत राज्य निगरानी समिति का गठन पहले ही किया जा चुका है।
अदालत को यह भी बताया गया कि 6 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय उच्च-स्तरीय समिति की पहली बैठक आयोजित हुई थी, जिसमें हिमाचल प्रदेश सरकार के विशेष सचिव (गृह) दिलीप कुमार नेगी ने भाग लिया।
इसके बाद 25 मई 2026 को महानिदेशक (जेल एवं सुधार सेवाएं) ने राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को बैठक के निर्णयों के अनुपालन की जानकारी दी।
मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।
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