भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मंडी के वैज्ञानिकों ने स्वास्थ्य जांच के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। संस्थान की एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) आधारित संपर्क रहित जांच तकनीक को पेटेंट मिल गया है। यह तकनीक केवल 50 माइक्रो लीटर सीरम की एक बूंद का विश्लेषण कर लिवर और किडनी संबंधी बीमारियों का शुरुआती आकलन करने में सक्षम है।
बिना संपर्क के होगी जांच
इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जांच के दौरान सीरम की बूंद किसी टेस्ट ट्यूब, कांच की स्लाइड या अन्य सतह के संपर्क में नहीं आती। अकूस्टिक लेविटेशन तकनीक की मदद से सीरम की बूंद को हवा में स्थिर रखा जाता है, जिससे नमूने के दूषित होने की संभावना काफी कम हो जाती है।
एआई और मशीन लर्निंग से मिलेगा सटीक परिणाम
इसके बाद स्पेक्ट्रोफोटोमेट्रिक विश्लेषण और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की सहायता से बिलीरुबिन के स्तर का आकलन किया जाता है। मशीन लर्निंग मॉडल इस डेटा के आधार पर लिवर और किडनी से जुड़ी संभावित बीमारियों के शुरुआती संकेत देता है।
यह तकनीक कम मात्रा में लिए गए नमूनों से भी विश्वसनीय और तेज जांच संभव बनाती है।
सफल रहा प्रयोगशाला परीक्षण
शोधकर्ताओं के अनुसार तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफल सत्यापन पूरा हो चुका है। वर्तमान में इसका कार्यशील प्रोटोटाइप विकसित किया जा रहा है। भविष्य में इसे अस्पतालों, क्लीनिकल लैब, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक केंद्रों और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में उपयोग के लिए विकसित किया जाएगा।
विशेष रूप से दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां उन्नत जांच सुविधाएं सीमित हैं, यह तकनीक मरीजों के लिए काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
2025 में किया था पेटेंट आवेदन
इस तकनीक के लिए पेटेंट आवेदन 24 मई 2025 को दायर किया गया था, जिसे 29 अप्रैल 2026 को मंजूरी मिल गई।
इन वैज्ञानिकों का रहा योगदान
इस नवाचार को विकसित करने में देओकृष्ण कुमार चौधरी, योगेश दासगांवकर, डॉ. दुबे धीरज प्रकाशचंद, डॉ. राधे श्याम शर्मा और डॉ. रविंद्र नाइक बुक्के का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
परियोजना को आईआईटी मंडी कैटलिस्ट के निद्धि प्रयास कार्यक्रम का सहयोग प्राप्त हुआ है। अब शोध दल इस तकनीक के व्यावसायीकरण के लिए उद्योग साझेदारों की तलाश कर रहा है। साथ ही इस शोध पर आधारित वैज्ञानिक शोधपत्र भी तैयार किया जा रहा है।
शोधकर्ता ने क्या कहा?
आईआईटी मंडी के शोधकर्ता डॉ. राधे श्याम शर्मा ने बताया कि तकनीक का प्रयोगशाला स्तर पर सफल सत्यापन हो चुका है और वर्तमान में इसका कार्यशील प्रोटोटाइप तैयार किया जा रहा है। भविष्य में इसे अस्पतालों, क्लीनिकल लैब, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक केंद्रों में उपयोग के लिए विकसित करने की योजना है।
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