मंडी (टिहरा):
मंडी ज़िले का टिहरा ज़िला परिषद वार्ड इस बार हिमाचल प्रदेश की सबसे चर्चित सीटों में से एक बनने जा रहा है। इस वार्ड में होने वाला आगामी चुनाव न केवल सत्ता और विपक्ष की प्रतिष्ठा का सवाल है, बल्कि यह भाजपा के भीतर 'अपनों' की जंग, कांग्रेस विधायक की रणनीति और माकपा की ज़मीनी पकड़ का असली इम्तिहान साबित होगा।
भाजपा में 'असली बनाम फ़सली' की लड़ाई
भाजपा के भीतर इस बार बगावत के सुर तेज हैं। तीन बार की पार्षद और पूर्व मंत्री ठाकुर महेंद्र सिंह की बेटी वंदना गुलेरिया की राह इस बार आसान नहीं दिख रही। उन्हें भाजपा की ही पृष्ठभूमि वाले पुराने आर्य परिवार की बहू रजिता वर्मा से कड़ी चुनौती मिल रही है।
आर्य परिवार ने खुद को 'असली भाजपा' और वंदना गुलेरिया के परिवार को 'फ़सली भाजपा' (अवसरवादी) करार देते हुए पार्टी टिकट पर अपना दावा ठोंक दिया है। संकेत हैं कि यदि रजिता वर्मा को आधिकारिक टिकट नहीं मिलता, तब भी वह निर्दलीय मैदान में उतर सकती हैं, जो वंदना गुलेरिया के वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकता है।
कांग्रेस का 'इमोशनल कार्ड' और आंतरिक कलह
दूसरी ओर, स्थानीय कांग्रेस विधायक ने एक बेहद चौंकाने वाला दांव खेलते हुए अनीता देवी को उम्मीदवार घोषित किया है। अनीता देवी, दिवंगत प्रभाष राणा की पत्नी हैं, जिनकी ढाई साल पहले भारी बारिश के दौरान एक परिवार की मदद करते समय दुखद मृत्यु हो गई थी।
विरोध के स्वर: विधायक के इस फैसले से कांग्रेस की सक्रिय महिला नेत्रियों में भारी रोष है, जो वर्षों से पार्टी के लिए काम कर रही हैं।
रणनीतिक चर्चा: राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधायक ने जानबूझकर कमजोर उम्मीदवार उतारा है ताकि वंदना गुलेरिया की जीत सुनिश्चित हो सके। इसके पीछे की मंशा वंदना और उनके भाई रजत ठाकुर के बीच विधानसभा टिकट को लेकर चल रहे विवाद को और हवा देना माना जा रहा है।
भूपेंद्र सिंह: चुनाव के असली 'किंग मेकर'
इस पूरे चुनावी घमासान की चाबी फिलहाल माकपा नेता एवं पूर्व ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह के पास नजर आ रही है। क्षेत्र की सभी 19 पंचायतों में भूपेंद्र सिंह का मजबूत आधार है।
हालांकि महिला सीट आरक्षित होने के कारण वे स्वयं चुनाव नहीं लड़ पा रहे हैं, लेकिन उनका समर्थन जिस ओर जाएगा, जीत उसी की सुनिश्चित मानी जा रही है। अब सबकी नजरें इस पर हैं कि माकपा अपना उम्मीदवार उतारती है या किसी का समर्थन करती है।
विधायक की कार्यप्रणाली पर 'रेफरेंडम'
यह चुनाव स्थानीय विधायक के लिए भी किसी जनमत संग्रह (Referendum) से कम नहीं है। विपक्ष का आरोप है कि पिछले तीन वर्षों में क्षेत्र में विकास कार्य ठप पड़े हैं और विधायक केवल भावनात्मक मुद्दों के सहारे चुनाव जीतना चाहते हैं।
वहीं, कुछ प्रभावशाली ठेकेदारों की भूमिका को लेकर भी जनता में चर्चाएं तेज हैं। कुल मिलाकर, टिहरा ज़िला परिषद वार्ड का मुकाबला अब केवल हार-जीत तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह आने वाले विधानसभा चुनावों की पटकथा भी लिखेगा।
क्या जनता 'असली भाजपा' के नारे पर मुहर लगाएगी या विधायक का 'इमोशनल कार्ड' काम करेगा? इसका फैसला अब माकपा की रणनीति और जनता के मिजाज पर टिका है।