स्वारघाट
आज के आधुनिक और व्यावसायिक दौर में जहां अक्सर सरकारी व निजी स्कूलों से व्यवस्थाओं की कमी या शिकायतों की खबरें ही सुर्खियां बनती हैं, वहीं उपमंडल स्वारघाट के राजकीय प्राथमिक पाठशाला किकरवाली (GPS Kikarwali) से सामने आई एक अद्भुत तस्वीर ने लोगों का दिल जीत लिया है।
स्कूल के भीतर भोजन के समय बच्चों के प्रति जो मातृत्व भाव देखने को मिला, उसकी तस्वीरें और वीडियो अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गए हैं।
किताबों के ज्ञान के साथ मिला मां जैसा लाड-प्यार
राजकीय प्राथमिक पाठशाला किकरवाली में दोपहर के समय जब मिड-डे मील (Mid-Day Meal) का समय हुआ, तो वहां तैनात जेबीटी शिक्षिका (मैडम) और मिड-डे मील कार्यकर्ता छोटे-छोटे नौनिहालों को अपने पास बैठाकर बिल्कुल एक मां की तरह अपने हाथों से भोजन खिलाती नजर आईं।
मां की तरह बच्चों को दुलारते और प्यार से निवाला मुंह में डालते हुए उनका यह स्नेहपूर्ण दृश्य वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर गया।
स्कूल नहीं, बच्चों का 'दूसरा घर' साबित हुआ विद्यालय
भोजन करते समय मासूम बच्चों के चेहरों पर तैरती मासूम मुस्कान और शिक्षिका व रसोईया के चेहरे पर झलकता अपनापन यह साफ बयां कर रहा था कि यह विद्यालय केवल पढ़ाई का नीरस केंद्र नहीं, बल्कि इन नौनिहालों के लिए उनका 'दूसरा घर' बन चुका है। अध्यापकों का यही व्यवहार बच्चों के भीतर स्कूल आने की ललक और शिक्षा के प्रति उनके लगाव को दोगुना कर देता है।
स्थानीय अभिभावकों ने कहा: 'यही हैं शिक्षा व्यवस्था की असली पहचान'
इस भावुक कर देने वाले नजारे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर आते ही पूरे क्षेत्र में तारीफों का दौर शुरू हो गया है। बच्चों के अभिभावकों और स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि ऐसे समर्पित शिक्षक और कर्मचारी ही हमारी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था की असली रीढ़ और पहचान हैं।
ये वो लोग हैं जो बच्चों को केवल किताबी ज्ञान की चारदीवारी में नहीं बांधते, बल्कि उन्हें एक सुरक्षित और पारिवारिक माहौल देकर उनके भविष्य की नींव रखते हैं।
सोशल मीडिया पर जमकर मिल रही सराहना, लोग बोले– 'ममता की अनूठी मिसाल'
इंटरनेट मीडिया (Facebook & WhatsApp Groups) पर भी इस मानवीय और संवेदनशील पहल की जमकर सराहना हो रही है। नेटिजंस इसे "ममता की अनूठी मिसाल" और "आदर्श पाठशाला" का नाम दे रहे हैं।
लोगों का कहना है कि यदि प्रदेश के हर सरकारी और निजी विद्यालय में नौनिहालों को ऐसा सुरक्षित और स्नेहपूर्ण वातावरण मिलने लगे, तो बच्चों के ड्रॉप-आउट रेट में भारी कमी आएगी और सरकारी स्कूलों के प्रति जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।