छह साल बाद फिर शुरू हुआ सीमा व्यापार, केवल पंजीकृत स्थानीय व्यापारी ले रहे हिस्सा; 30 नवंबर तक चल सकता है कारोबारी सीजन
एक ओर पूरी दुनिया डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन लेनदेन की ओर बढ़ चुकी है, वहीं हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में भारत-चीन सीमा पर स्थित शिपकी ला आज भी सदियों पुरानी वस्तु विनिमय (बार्टर) प्रणाली को जीवित रखे हुए है। यहां व्यापार नकद या डिजिटल माध्यम से नहीं, बल्कि सामान के बदले सामान के आदान-प्रदान के जरिए किया जाता है।
करीब छह साल के अंतराल के बाद शनिवार से शिपकी ला मार्ग के साथ उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथू ला मार्ग से भी भारत-चीन सीमा व्यापार दोबारा शुरू हुआ। हालांकि शिपकी ला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां आज भी वर्ष 1697 में हुई ऐतिहासिक संधि के नियमों के अनुसार व्यापार संचालित किया जाता है।
1697 की संधि पर आधारित है व्यापार व्यवस्था
शिपकी ला में वस्तु विनिमय व्यापार की शुरुआत वर्ष 1697 में हुई थी। उस समय तिब्बत और तत्कालीन बुशहर रियासत के राजा केहरी सिंह के बीच एक पारंपरिक व्यापार समझौता हुआ था। यह समझौता किसी लिखित दस्तावेज पर नहीं, बल्कि स्थानीय लोक शपथ 'गामग्या' और आपसी विश्वास पर आधारित था।
तीन शताब्दियों से अधिक समय बीतने के बावजूद यह परंपरा आज भी कायम है और व्यापार उसी व्यवस्था के तहत किया जाता है।
भारत-चीन युद्ध के बाद वर्ष 1962 में शिपकी ला मार्ग से होने वाला व्यापार बंद कर दिया गया था। बाद में दोनों देशों के बीच हुए द्विपक्षीय प्रोटोकॉल के तहत वर्ष 1992-94 के दौरान इसे दोबारा शुरू किया गया।
व्यापार में भाग लेने वाले भारतीय व्यापारियों की संख्या समय-समय पर बदलती रही। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1994 में सबसे अधिक 90 भारतीय व्यापारियों ने इस सीमा व्यापार में भाग लिया। इसके बाद 2015 में 71, 2016 में 75, 2017 में 34, 2018 में 37 और 2019 में 45 व्यापारियों ने सीमा पार व्यापार किया।
केवल सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत व्यापारियों को अनुमति
इस व्यापार में ऊपरी किन्नौर के सीमावर्ती गांवों नामगिया, चुप्पन, नाको, पूह और चांगो के पंजीकृत स्थानीय व्यापारी ही हिस्सा ले सकते हैं। सरकार ने आयात और निर्यात के लिए चुनिंदा वस्तुओं की सूची निर्धारित की है और उन्हीं वस्तुओं का आदान-प्रदान किया जाएगा।
30 नवंबर तक चल सकता है कारोबारी सीजन
शिपकी ला ट्रेड ऑफिसर भीम सिंह के अनुसार, इस वर्ष सीमा व्यापार का कारोबारी सीजन 30 नवंबर तक चलने की संभावना है। उन्होंने बताया कि इस बार भी व्यापार केवल पुह उपमंडल के सीमावर्ती गांवों के पंजीकृत स्थानीय व्यापारियों तक ही सीमित रहेगा।
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