टेलीकॉम कर्मचारी और पुलिस अधिकारी बनकर ठगों ने 6.8 करोड़ के लेन-देन का हवाला दिया, गिरफ्तारी का डर दिखाकर करीब एक महीने तक करवाते रहे निगरानी और बैंक खातों में ट्रांसफर
कांगड़ा में साइबर ठगी का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां 64 वर्षीय व्यक्ति को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसने और गिरफ्तारी का डर दिखाकर करीब एक महीने तक कथित तौर पर ‘डिजिटल कैद’ में रखा गया। साइबर ठगों ने अलग-अलग पहचान बताकर पीड़ित को अपने जाल में फंसाया और उससे कुल 1,78,71,812 रुपये की रकम अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवा ली।
मामले की शुरुआत 30 जुलाई 2026 को हुई, जब बांदला निवासी सुरेश कुमार को एक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को दिल्ली की एक दूरसंचार कंपनी का कर्मचारी बताया और दावा किया कि सुरेश कुमार के आधार कार्ड तथा बैंक खाते का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया गया है।
ठगों ने उसके नाम से आईसीआईसीआई बैंक खाते में करीब 6.8 करोड़ रुपये के कथित लेन-देन का हवाला देते हुए गिरफ्तारी वारंट जारी होने की बात कही।
इसके बाद ठगों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताकर पीड़ित पर दबाव और बढ़ा दिया। उसे गंभीर कानूनी कार्रवाई और गिरफ्तारी का डर दिखाया गया। आरोप है कि ठगों ने 70 लाख रुपये देने पर जांच में राहत दिलाने और मामला खत्म कराने का भरोसा भी दिया। डर के माहौल में पीड़ित लगातार उनके निर्देशों का पालन करता रहा।
हर एक-दो घंटे में गतिविधियों का देना पड़ता था हिसाब
एफआईआर के अनुसार, पीड़ित को लगातार फोन पर निर्देश दिए जाते थे। उससे उसकी यात्रा, मोबाइल रिकॉर्ड, बैंक खातों और आर्थिक लेन-देन से जुड़ी जानकारी मांगी जाती रही। उसे हर एक-दो घंटे में अपनी गतिविधियों का हिसाब देने के लिए कहा जाता था। इस तरह ठगों ने कथित तौर पर उसे लगातार निगरानी में होने का एहसास कराया और करीब एक महीने तक मानसिक दबाव में रखा।
अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई रकम
एफआईआर में भारतीय स्टेट बैंक, हिमाचल ग्रामीण बैंक की बांदला शाखा, पंजाब नेशनल बैंक, शांति क्रेडिट सहकारी सोसायटी और यूको बैंक समेत विभिन्न बैंक खातों में किए गए लेन-देन का उल्लेख है। शिकायतकर्ता ने पुलिस को संबंधित बैंक खातों और यूटीआर से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध करवाई है।
सोना और संपत्ति के दस्तावेज भी मांगे
साइबर ठगों का दबाव केवल बैंक खातों तक सीमित नहीं रहा। एफआईआर के मुताबिक, पीड़ित से उसके सोने के बिल और जीएसटी से जुड़े दस्तावेज मांगे गए। जब सोने के बिल उपलब्ध नहीं थे तो उसे सोना गिरवी रखने और उसके बदले मिलने वाली ऋण रसीद देने के लिए कहा गया। इसके बावजूद आरोपितों की ओर से बैंक खातों में रकम ट्रांसफर करने के निर्देश जारी रहे।
इसके बाद 26 अगस्त को आरोपितों ने पीड़ित से संपत्ति के दस्तावेज और वाहन का पंजीकरण प्रमाणपत्र भी मांगा। 27 अगस्त को दस्तावेज उपलब्ध करवाने के बाद कथित तौर पर उसे बताया गया कि अब वह “सुरक्षित” है।
हालांकि, 28 अगस्त की सुबह आरोपितों से पीड़ित का संपर्क टूट गया। इसके बाद उसे एहसास हुआ कि वह मनी लॉन्ड्रिंग की जांच में फंसा व्यक्ति नहीं, बल्कि साइबर ठगी का शिकार बना है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए साइबर अपराध पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब बैंक खातों, यूटीआर और आरोपितों की ओर से किए गए फोन कॉल समेत अन्य डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर रही है।
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