हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की 186 शिक्षक नियुक्तियों पर उठे सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी, भर्ती व्यवस्था में सुधार के साथ अकादमिक स्वायत्तता की भी हो रक्षा
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय सहित राज्य के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती व्यवस्था को बदलकर इसका अधिकार राज्य लोक सेवा आयोग को सौंपने का प्रस्ताव गंभीर बहस का विषय है।
प्रशासनिक सुधार और पारदर्शिता के नाम पर भर्ती प्रक्रिया में बदलाव की आवश्यकता पर चर्चा हो सकती है, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि विश्वविद्यालय में भर्ती के दौरान गंभीर अनियमितताएं हुई हैं तो उनका समाधान क्या होना चाहिए।
क्या विश्वविद्यालय की शैक्षणिक स्वायत्तता को सीमित करना इसका जवाब है या पहले कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए?
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय राज्य का प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थान है। विश्वविद्यालय की स्वायत्तता केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि उसकी शैक्षणिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है।
शिक्षकों की नियुक्ति में विषय विशेषज्ञता, शोध क्षमता, अकादमिक आवश्यकता और विभागीय परिस्थितियों की अहम भूमिका होती है। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया में सुधार के नाम पर विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक शक्तियों को पूरी तरह किसी बाहरी संस्था को सौंपना एक व्यापक और गंभीर निर्णय होगा।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया में सामने आए कथित अनियमितताओं का है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में वर्ष 2020 से 2023 के दौरान हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में हुई 186 शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर गंभीर आपत्तियां दर्ज किए जाने का दावा किया गया है।
इनमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के प्रमाण-पत्रों, शैक्षणिक योग्यताओं और अन्य दस्तावेजों के संबंधित प्राधिकरणों से सत्यापन के अभिलेख उपलब्ध न होने जैसे सवाल शामिल हैं। कुछ नियुक्तियों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पात्रता मानदंडों के अनुपालन को लेकर भी प्रश्न उठे हैं।
इन सवालों को केवल प्रशासनिक टिप्पणियां मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि नियुक्तियों को लेकर गंभीर आपत्तियां सामने आई हैं और विद्यार्थी सूचना के अधिकार के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर जांच की मांग कर रहे हैं, तो सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
केवल भविष्य में भर्ती प्रक्रिया बदलने से अतीत में हुई कथित अनियमितताओं का समाधान नहीं होगा। पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या हुआ, किन नियमों का उल्लंघन हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।
186 नियुक्तियों की स्वतंत्र और समयबद्ध न्यायिक जांच होनी चाहिए। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समूह को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि तथ्यों को निष्पक्ष रूप से सामने लाना होना चाहिए।
प्रत्येक नियुक्ति में पात्रता, प्रमाण-पत्रों की वास्तविकता, शैक्षणिक योग्यता, यूजीसी के नियमों का पालन, चयन प्रक्रिया की वैधानिकता और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच आवश्यक है।
यदि जांच में दस्तावेजों में हेराफेरी, गलत जानकारी, नियमों का उल्लंघन या अनुचित प्रभाव साबित होता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही यह भी तय होना चाहिए कि भर्ती प्रक्रिया में सत्यापन और चयन की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों की भूमिका क्या रही।
जांच का दायरा व्यापक हो
मामले की जांच केवल 186 शिक्षक नियुक्तियों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। विश्वविद्यालय में करियर उन्नयन योजना के तहत कथित अनियमित लाभ, निर्माण कार्यों और अन्य प्रशासनिक गतिविधियों में भ्रष्टाचार के आरोप तथा महाविद्यालयों और निजी संस्थानों के निरीक्षण से जुड़ी शिकायतों की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
यदि लिखित शिकायतें और सूचना के अधिकार के माध्यम से प्राप्त दस्तावेज उपलब्ध हैं, तो उनकी जांच करना संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। जांच के बाद तथ्य सामने आने चाहिए और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
मामले को राजनीति से ऊपर उठकर देखने की जरूरत
इस पूरे मामले को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखने की आवश्यकता है। यदि किसी अनियमितता का संबंध किसी विशेष सरकार या अधिकारी के कार्यकाल से है तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। भाजपा हो या कांग्रेस, किसी भी सरकार के कार्यकाल में यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
विश्वविद्यालय की भर्ती व्यवस्था को राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक दबाव और व्यक्तिगत हितों से मुक्त रखना आवश्यक है। यही उच्च शिक्षा संस्थानों में विश्वास बहाल करने का सबसे मजबूत रास्ता हो सकता है।
स्वायत्तता का मतलब जवाबदेही से मुक्ति नहीं
विश्वविद्यालय की स्वायत्तता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है। स्वायत्तता का अर्थ यह है कि विश्वविद्यालय अपनी अकादमिक आवश्यकताओं के अनुरूप पारदर्शी और योग्यता आधारित निर्णय ले सके। इसके साथ ही विश्वविद्यालय कानून, यूजीसी के नियमों और निर्धारित प्रक्रियाओं के प्रति पूरी तरह जवाबदेह रहे।
इसलिए सुधार का रास्ता विश्वविद्यालय की स्वायत्तता समाप्त करना नहीं, बल्कि स्वायत्तता के साथ पारदर्शिता, निगरानी और कठोर जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए।
सरकार को प्रस्तावित विधेयक पर जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय पहले भर्ती संबंधी आरोपों की स्वतंत्र न्यायिक जांच करवानी चाहिए। जांच समयबद्ध हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ यदि किसी ने गलत तरीके से आर्थिक लाभ प्राप्त किया है तो नियमानुसार उसकी वसूली भी की जानी चाहिए।
विद्यार्थियों द्वारा आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के आधार पर उठाए गए सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और प्रदेश की जनता को यह जानने का अधिकार है कि 186 नियुक्तियों में वास्तव में क्या हुआ।
आज आवश्यकता विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसे भ्रष्टाचार और अनियमितताओं से मुक्त करने की है। इसलिए मांग स्पष्ट होनी चाहिए—186 नियुक्तियों की स्वतंत्र न्यायिक जांच हो, दोषियों की जिम्मेदारी तय की जाए, गलत तरीके से मिले लाभ की वसूली हो और साथ ही हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की शैक्षणिक स्वायत्तता
की रक्षा की जाए। भर्ती व्यवस्था में खामी है तो उसे दूर किया जाना चाहिए, लेकिन विश्वविद्यालय की स्वायत्तता समाप्त करना उसका समाधान नहीं हो सकता।
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