अदालत ने कहा- सेवानिवृत्ति के आधार पर वेतन विसंगति सुधारने से इनकार नहीं किया जा सकता। बिजली बोर्ड के कर्मचारी की याचिका पर सुनाया फैसला।
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कर्मचारियों के वेतन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सेवा में वरिष्ठ कर्मचारी को किसी भी स्थिति में अपने कनिष्ठ कर्मचारी से कम वेतन नहीं दिया जा सकता।
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि ऐसी वेतन विसंगति सामने आती है तो संबंधित विभाग को 'स्टेपिंग अप' प्रक्रिया के माध्यम से इसे दूर करना होगा। साथ ही, कर्मचारी के सेवानिवृत्त होने का आधार बनाकर वेतन सुधार से इनकार नहीं किया जा सकता।
यह आदेश न्यायमूर्ति जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने एमके सूद द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
एमके सूद ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
याचिकाकर्ता एमके सूद वर्ष 1969 में बिजली बोर्ड में 'आइलर एंड क्लीनर' के पद पर नियुक्त हुए थे। इसके बाद अगस्त 1971 में उन्हें सब स्टेशन अटेंडेंट (एसएसए) बनाया गया और सितंबर 1983 में वे जूनियर इंजीनियर के पद पर पदोन्नत हुए। आगे चलकर उन्होंने असिस्टेंट इंजीनियर के पद तक सेवाएं दीं।
वहीं, एक अन्य कर्मचारी पुरुषोत्तम राम वर्ष 1975 में सीधे एसएसए पद पर नियुक्त हुए थे और सितंबर 1983 में जूनियर इंजीनियर बने।
याचिकाकर्ता के अनुसार, वह हर कैडर में पुरुषोत्तम राम से वरिष्ठ थे, लेकिन इसके बावजूद उनका वेतन उनसे कम हो गया।
2003 में सामने आई वेतन विसंगति
याचिकाकर्ता ने बताया कि अलग-अलग स्थानों पर तैनाती के कारण उन्हें वर्ष 2003 में इस वेतन विसंगति की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने बिजली बोर्ड के समक्ष शिकायत दर्ज करवाई।
हालांकि, बोर्ड ने 25 मई 2006 को उनकी मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि उन्होंने समय पर सही विकल्प का चयन नहीं किया था।
सेवानिवृत्ति के बाद भी दावा खारिज किया गया
एमके सूद 29 फरवरी 2008 को असिस्टेंट इंजीनियर पद से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद 17 अक्टूबर 2008 को विभाग ने एक और पत्र जारी कर उनका दावा बंद कर दिया।
बोर्ड का तर्क था कि कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं और वेतन संशोधन का उनकी पेंशन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी फैसले को उन्होंने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
कोर्ट ने माना कर्मचारी का अधिकार
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद स्पष्ट किया कि वरिष्ठ कर्मचारी को कनिष्ठ से कम वेतन मिलना सेवा नियमों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
अदालत ने कहा कि विभाग की जिम्मेदारी है कि ऐसी विसंगतियों को दूर किया जाए और कर्मचारी को उसका उचित वेतन लाभ दिया जाए। सेवानिवृत्ति के आधार पर कर्मचारी के अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता।
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