वेतन निर्धारण के लिए अलग-अलग विकल्प चुनने के कारण आया ₹4,000 का अंतर, हाईकोर्ट ने सुभाष कुमार की याचिका की खारिज
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के वेतन निर्धारण को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वरिष्ठ कर्मचारी का वेतन उसके कनिष्ठ कर्मचारी से कम है और इसकी वजह वरिष्ठ कर्मचारी की ओर से स्वेच्छा से चुना गया वेतन निर्धारण का विकल्प है, तो वह इसे वेतन विसंगति बताकर जूनियर के बराबर वेतन की मांग नहीं कर सकता।
न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने कहा कि हिमाचल प्रदेश सिविल सर्विसेज (रिवाइज्ड पे) रूल्स, 2022 के नियम 9(2) के तहत अलग-अलग विकल्प चुनने के कारण वेतन में अंतर आने पर वरिष्ठ कर्मचारी वेतन बढ़ोतरी यानी स्टेप-अप का हकदार नहीं होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सुभाष कुमार की ओर से दायर याचिका खारिज कर दी।
क्या था पूरा मामला?
याचिकाकर्ता सुभाष कुमार और उनके कनिष्ठ कर्मचारी बाल किशन की नियुक्ति वर्ष 1991 में चुनाव विभाग में पटवारी के पद पर हुई थी। दोनों को वर्ष 2010 में कानूनगो, 2016 में नायब तहसीलदार और मार्च 2022 में तहसीलदार के पद पर पदोन्नति मिली थी।
सुभाष कुमार ने अदालत में दलील दी थी कि दिसंबर 2025 की वेतन जानकारी के अनुसार उनका मूल वेतन 65,800 रुपये था, जबकि उनके जूनियर बाल किशन का मूल वेतन 69,800 रुपये था। इस तरह दोनों के वेतन में 4,000 रुपये का अंतर था। उन्होंने अपने जूनियर के बराबर वेतन निर्धारित करने की मांग की थी।
अलग-अलग विकल्प चुनने से पैदा हुआ वेतन अंतर
याचिकाकर्ता का आरोप था कि वर्ष 2010 में पदोन्नति के समय उन्हें वेतन निर्धारण का विकल्प नहीं दिया गया था। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड में सामने आया कि दोनों कर्मचारियों को विकल्प चुनने का अवसर मिला था।
सुभाष कुमार ने 15 जून 2010 को पदोन्नति जॉइन करने की तारीख से ही अपना वेतन निर्धारित करवाने का विकल्प चुना था। वहीं, उनके जूनियर बाल किशन ने पटवारी के पद पर अगली सालाना वेतन वृद्धि जुड़ने के बाद 1 जनवरी 2011 से वेतन निर्धारण का विकल्प चुना। इसी कारण वर्ष 2011 से ही बाल किशन का वेतन सुभाष कुमार से अधिक हो गया।
इसके अलावा जनवरी 2022 में नए वेतन नियम लागू होने के बाद भी दोनों कर्मचारियों ने अलग-अलग विकल्प चुने। सुभाष कुमार ने 2.59 के फैक्टर से वेतन संशोधन का विकल्प अपनाया, जबकि बाल किशन ने 15 प्रतिशत वेतन वृद्धि वाले दूसरे नोटिफिकेशन के तहत वेतन निर्धारण करवाया। इन अलग-अलग विकल्पों के कारण दोनों के वेतन में अंतर बना रहा।
याचिका दायर करने में देरी भी बनी वजह
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि सुभाष कुमार वर्ष 2011 से कम वेतन प्राप्त कर रहे थे, लेकिन उन्होंने पहली बार वर्ष 2019 में विभाग के समक्ष इस संबंध में प्रतिवेदन दिया था। विभाग ने वर्ष 2020 में उनकी मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद भी उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर करने के लिए करीब छह साल का समय लगा दिया।
अदालत ने पाया कि वेतन में अंतर किसी अतिरिक्त इंक्रीमेंट या एसीपी के लाभ के कारण नहीं, बल्कि याचिकाकर्ता की ओर से स्वेच्छा से चुने गए अलग-अलग वेतन निर्धारण विकल्पों का परिणाम था। ऐसे में वह अपने जूनियर के बराबर वेतन निर्धारित करवाने और स्टेप-अप का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है।
इन्हीं तथ्यों और याचिका दायर करने में हुई देरी को ध्यान में रखते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सुभाष कुमार की याचिका खारिज कर दी।
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