कोर्ट बोला- नए कानूनी अधिकार तय करने वाले पारिवारिक समझौते का पंजीकरण अनिवार्य, अंतिम बंटवारे तक जमीन रहेगी साझा
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि किसी पारिवारिक या घरेलू बंटवारे के माध्यम से नए कानूनी अधिकार तय किए जाते हैं, तो ऐसे दस्तावेज का पंजीकरण अनिवार्य होगा। बिना पंजीकरण ऐसे समझौतों को अदालत में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने खारिज की नियमित द्वितीय अपील
यह फैसला न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की एकलपीठ ने प्रेम कुमार बनाम प्रकाश चंद शर्मा मामले में सुनाया। अदालत ने प्रतिवादी की नियमित द्वितीय अपील खारिज करते हुए निचली अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि कोई दस्तावेज केवल पुराने बंटवारे का उल्लेख नहीं करता, बल्कि नए सिरे से मालिकाना अधिकार तय करता है, तो पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 17(1)(b) के तहत उसका पंजीकरण अनिवार्य है। इस मामले में वर्ष 1978 का पारिवारिक समझौता अपंजीकृत था, इसलिए उसे कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती।
अंतिम बंटवारे तक जमीन मानी जाएगी साझा
अदालत ने कहा कि जब तक राजस्व विभाग के माध्यम से भूमि का कानूनी रूप से अंतिम बंटवारा नहीं हो जाता, तब तक पूरी जमीन संयुक्त (साझा) मानी जाएगी। ऐसे में कोई भी सह-स्वामी जमीन के सबसे मूल्यवान हिस्से पर जबरन कब्जा या निर्माण नहीं कर सकता।
गवाहों के बयानों से क्या हुआ स्पष्ट
सुनवाई के दौरान गवाहों के बयानों से सामने आया कि प्रतिवादी के कब्जे में 12 बिस्वा से अधिक भूमि थी, जबकि वादी के हिस्से में केवल पांच बिस्वा जमीन थी। साथ ही, भूमि विभाजन का मामला जिला कलेक्टर के समक्ष अपील में लंबित था, जिससे स्पष्ट हुआ कि बंटवारा अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ था।
1993 से चल रहा था भूमि विवाद
यह मामला मंडी जिले के करसोग (पांगणा) क्षेत्र का है। मूल वादी प्रकाश चंद शर्मा ने वर्ष 1993 में सिविल कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि प्रतिवादी प्रेम कुमार साझा भूमि पर अवैध निर्माण कर पूर्वजों के समय से इस्तेमाल हो रहे रास्ते को बंद कर रहे हैं।
प्रतिवादी का दावा था कि 29 जून 1978 को परिवार के बीच हुए समझौते के अनुसार भूमि का बंटवारा हो चुका था और निर्माण उनके हिस्से में किया जा रहा था।
निचली अदालत का फैसला पलटा गया
करसोग की ट्रायल कोर्ट ने 1978 के समझौते को मान्य मानते हुए वादी का दावा खारिज कर दिया था। हालांकि, वर्ष 2003 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, मंडी ने यह फैसला पलट दिया और कहा कि राजस्व अधिकारियों के समक्ष विभाजन का मामला लंबित होने के कारण कोई भी पक्ष पूरी जमीन पर एकाधिकार नहीं जता सकता। इसी फैसले को हाई कोर्ट ने भी सही ठहराया।
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