हीरानगर के एमआर होम की खामियों पर कोर्ट सख्त, 5.24 करोड़ के भवन में सुधार के लिए 8.28 करोड़ का अनुमान देख जताई नाराजगी
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने दिव्यांगजनों के अधिकारों के संरक्षण और उनके लिए उपलब्ध सुविधाओं को लेकर प्रदेश सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश चिराग भानु की खंडपीठ ने शिमला के हीरानगर स्थित एमआर होम (मेंटल रिटार्डेशन होम) के निर्माण में सामने आई गंभीर खामियों पर कड़ा संज्ञान लिया।
अदालत ने आदेश दिया कि दोषपूर्ण बुनियादी ढांचे के डिजाइन को मंजूरी देने वाले अधिकारी या व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जाए। कोर्ट ने कहा कि जनता के पैसे की इस तरह की बर्बादी के लिए जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान जरूरी है। इस मामले में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव से ताजा हलफनामा भी तलब किया गया है।
5.24 करोड़ के भवन में व्हीलचेयर तक नहीं पहुंच सकती
हीरानगर में 50 मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए एमआर होम, हॉस्टल और स्कूल भवन का निर्माण करीब 5.24 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से किया गया था। अदालत के समक्ष भवन की ऐसी खामियां सामने आईं, जो दिव्यांग बच्चों की जरूरतों के लिहाज से गंभीर हैं।
कोर्ट ने पाया कि भवन के कई कमरों और बाथरूम के दरवाजे इतने संकरे हैं कि व्हीलचेयर या वॉकर का इस्तेमाल करने वाले बच्चे इन सुविधाओं तक आसानी से पहुंच ही नहीं सकते।
सबसे गंभीर बात यह रही कि अब इन कमियों को दूर करने और भवन में आवश्यक बदलाव करने के लिए 828.47 लाख रुपये यानी करीब 8.28 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान लगाया गया है। यह राशि भवन की मूल निर्माण लागत से भी अधिक है।
दृष्टिबाधितों के ग्रुप-डी पद भरने के निर्देश
हाईकोर्ट ने सरकार को अगली सुनवाई से पहले दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए खाली पड़े सभी क्लास-फोर यानी ग्रुप-डी पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि इसके लिए आवश्यक विज्ञापन तत्काल जारी किए जाएं।
अदालत के समक्ष सशक्तिकरण विभाग के निदेशक की ओर से ग्रुप-सी और ग्रुप-डी श्रेणी में दिव्यांगजनों के लिए आरक्षित सभी रिक्त पदों को विशेष अभियान के तहत एक साथ भरने की अनुमति मांगे जाने का मामला भी आया।
सरकार की दलील को हाईकोर्ट ने किया खारिज
राज्य सरकार ने विशेष अभियान के प्रस्ताव को यह कहते हुए स्वीकार नहीं किया था कि किसी एक आरक्षित श्रेणी के सभी पदों को एक साथ भरना भेदभावपूर्ण होगा। हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
अदालत ने पंजाब सरकार का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां विशेष अभियान चलाकर दृष्टिबाधित लोगों के लिए ग्रुप-डी के पद भरे गए हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल आती है।
36 विभागों के आंकड़ों की समीक्षा
खंडपीठ ने प्रदेश के विभिन्न 36 सरकारी विभागों से संबंधित आंकड़ों की भी समीक्षा की। अदालत ने कहा कि दृष्टिबाधित वर्ग के चतुर्थ श्रेणी के अभ्यर्थियों को शैक्षणिक सुविधाओं की कमी के कारण उच्च पदों के लिए आवेदन करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
ऐसे में उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाने की आवश्यकता है। हाईकोर्ट ने सरकार को इस दिशा में कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 27 अक्तूबर को होगी।
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