चंबा।
हिमाचल प्रदेश में पिछले साल मानसून के दौरान आई भीषण आपदा के जख्मों पर मरहम लगने का इंतजार कर रहे प्रभावित परिवार आज भी मायूस और बेसहारा हैं। प्रदेश सरकार ने दावा किया था कि आपदा में घर गंवाने वाले प्रभावितों को नया मकान बनाने के लिए सात-सात लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।
लेकिन चंबा जिले के होली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सलून गांव के प्रभावित परिवारों को अब तक केवल तीन-तीन लाख रुपये ही मिल पाए हैं।
किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं परिवार, जमीन भी बही
साल 2025 की भीषण आपदा के दौरान रावी नदी में आई बाढ़ में सलून गांव के सात परिवारों के आशियाने पूरी तरह बह गए थे। घरों के साथ-साथ उनकी कृषि योग्य जमीन भी नदी के तेज बहाव की भेंट चढ़ गई।
आज हालात यह हैं कि ये प्रभावित परिवार किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि सरकार की ओर से अभी तक इन बेघर हुए परिवारों को किसी सुरक्षित स्थान पर जमीन भी उपलब्ध नहीं करवाई जा सकी है, जिससे इनके सामने नया मकान बनाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
तबाही के लिए पावर प्रोजेक्ट जिम्मेदार, नहीं बनी सुरक्षा दीवार
ग्रामीणों का आक्रोश इस बात को लेकर भी है कि रावी नदी में अभी तक सुरक्षा दीवार (रिटेनिंग वॉल) नहीं लगाई गई है। आगामी बरसात सिर पर है और ग्रामीणों को डर है कि यदि दोबारा बाढ़ आई, तो गांव की बची-खुची जमीन भी बह जाएगी।
आपदा प्रभावित चमन लाल, संतोष कुमार, राकेश कुमार, बलदेव, त्रिदेव और आकाश ने आरोप लगाया कि पिछले साल अगस्त में आई तबाही के पीछे स्थानीय पावर प्रोजेक्ट जिम्मेदार है।
प्रोजेक्ट प्रबंधन ने अपने ढांचे को बचाने के लिए रावी नदी के तट पर कंक्रीट की मजबूत दीवार खड़ी कर दी, जिसके कारण पानी का पूरा बहाव मुड़कर सीधे गांव की तरफ आ गया और पूरा सलून गांव तबाह हो गया। प्रभावित सनी कुमार ने रुआंसे होकर बताया कि जब बाढ़ आई, तो वे घर के अंदर रखा सामान और आभूषण तक नहीं बचा पाए और सरकार ने मदद के नाम पर मात्र तीन लाख रुपये थमा दिए।
NH पर खर्च हो रहे ₹60 करोड़, बत्ती दी हट्टी बना लैंडस्लाइड हॉटस्पॉट
दूसरी ओर, भरमौर राष्ट्रीय उच्च मार्ग (NH) पर बग्गा से लूणा तक सड़क का एक बड़ा हिस्सा रावी नदी में पूरी तरह बह गया था, जिसकी बहाली का कार्य अभी तक कछुआ गति से चल रहा है।
इस मार्ग पर 'बत्ती दी हट्टी' नामक स्थान अब भूस्खलन (लैंडस्लाइड) का बड़ा हॉटस्पॉट बन चुका है, जहां हल्की सी बारिश होते ही पहाड़ों से मलबा गिरना शुरू हो जाता है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग की मरम्मत पर सरकार द्वारा 60 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
लुहारका और गैहरा पंचायत में भी सरकारी मदद का इंतजार
आपदा का दंश सिर्फ सलून गांव तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत मैहला के लुहारका (टिपरी) में पिछली बरसात में हुए भूस्खलन से श्मशानघाट जाने वाला रास्ता बह गया था, जो आज तक नहीं सुधरा।
वहीं लुहारका गांव के निवासी चमन सिंह के मकान पर खतरा लगातार मंडरा रहा है। भूस्खलन के कारण मकान की नींव हवा में लटक गई है, लेकिन सरकार या प्रशासन ने यहाँ डंगा (सुरक्षा दीवार) लगाने की कोई व्यवस्था नहीं की।
इसके अलावा, ग्राम पंचायत गैहरा में पिछले साल बादल फटने से करीब 20 परिवारों के हरे-भरे खेत मलबे में मिलकर नाले में तब्दील हो गए थे। प्रभावित परिवारों का आरोप है कि आपदा के इतने महीनों बाद भी प्रशासनिक स्तर पर उनकी कोई सुध नहीं ली गई और न ही उन्हें कोई मुआवजा मिला है।