भाजपा प्रदेश सचिव ने केंद्र की मोदी सरकार और हरियाणा सरकार की भूमिका को सराहा, कहा- 20 वर्षों तक हिमाचल को हर साल मिलेगी करीब 598 मिलियन यूनिट बिजली
हिमाचल प्रदेश के बीबीएमबी बिजली एरियर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भाजपा प्रदेश सचिव कुमार सुमीत शर्मा ने प्रदेश के अधिकारों की ऐतिहासिक जीत करार दिया है। उन्होंने कहा कि 6 नवंबर 2026 को आया यह निर्णय केवल बिजली के बकाया हिस्से का मामला नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश के वैधानिक अधिकारों और दशकों से जारी न्याय की लड़ाई का महत्वपूर्ण पड़ाव है।
मीडिया से अनौपचारिक बातचीत में कुमार सुमीत शर्मा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हिमाचल को पूंजीगत लागत की देनदारी समायोजित करने के बाद करीब 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी है। पंजाब और हरियाणा को अगले 20 वर्षों तक हर साल लगभग 598 मिलियन यूनिट बिजली अक्टूबर से मार्च के बीच हिमाचल को उपलब्ध करवानी होगी।
क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
कुमार सुमीत शर्मा के अनुसार, वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तहत बीबीएमबी परियोजनाओं में हिमाचल प्रदेश की 7.19 प्रतिशत हिस्सेदारी निर्धारित की गई थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के अटॉर्नी जनरल की ओर से प्रस्तुत गणना को स्वीकार करते हुए कुल 13,066 मिलियन यूनिट बिजली के बकाये को आधार माना है।
उन्होंने बताया कि हिमाचल सरकार की 420.77 करोड़ रुपये की पूंजीगत लागत की देनदारी समायोजित करने के बाद प्रदेश को लगभग 11,973 मिलियन यूनिट बिजली मिलनी है। यह बिजली अगले 20 वर्षों में उपलब्ध करवाई जाएगी।
मोदी सरकार की भूमिका को सराहा
भाजपा प्रदेश सचिव ने कहा कि केंद्र सरकार के ऊर्जा मंत्रालय और भारत सरकार के अटॉर्नी जनरल ने वर्षों से लंबित विवाद के समाधान के लिए विस्तृत गणना और व्यावहारिक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, CAG से ऋण और पुनर्भुगतान के आंकड़े लेकर समाधान का ढांचा तैयार किया गया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अटॉर्नी जनरल के प्रयासों की सराहना की।
हरियाणा सरकार के रुख का भी किया उल्लेख
कुमार सुमीत शर्मा ने हरियाणा सरकार की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के नेतृत्व वाली सरकार ने केंद्र के प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति जताई। उनके अनुसार, हरियाणा ने सुप्रीम कोर्ट में 15 वर्षों में बकाया बिजली उपलब्ध करवाने के प्रस्ताव पर आपत्ति नहीं की और समाधान की प्रक्रिया में सहयोग किया।
पंजाब सरकार की आपत्तियों को कोर्ट ने नहीं माना
शर्मा ने आरोप लगाया कि पंजाब की भगवंत मान सरकार ने केंद्र की गणना पर आपत्तियां उठाईं। उनके मुताबिक, पंजाब ने 13,066 मिलियन यूनिट की गणना को घटाकर 11,094 मिलियन यूनिट करने, पूंजीगत लागत के समायोजन की दर और भुगतान की अवधि 30 वर्ष करने जैसे तर्क रखे थे।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की इन आपत्तियों को अस्पष्ट और सतही मानते हुए स्वीकार नहीं किया। शर्मा के अनुसार, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पहले से निर्धारित अधिकारों को दोबारा विवादित नहीं बनाया जा सकता।
1996 से जारी है हिमाचल के हिस्से की कानूनी लड़ाई
कुमार सुमीत शर्मा ने कहा कि बीबीएमबी में हिमाचल की हिस्सेदारी का मामला वर्ष 1996 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में दायर मुकदमे से जुड़ा है। वर्ष 2011 में प्रेम कुमार धूमल के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान हिमाचल के अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंची थी।
वहीं, वर्ष 2018 में जयराम ठाकुर सरकार ने बिजली एरियर के विषय पर पंजाब और हरियाणा के साथ बातचीत की थी।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने तीनों राज्यों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाते हुए इस लंबित मामले के समाधान की दिशा में भूमिका निभाई। उनके अनुसार, 6 नवंबर का फैसला वर्षों से चली आ रही कानूनी लड़ाई को लागू करने की दिशा में निर्णायक कदम है।
प्रदेश के अधिकारों पर समझौता नहीं होना चाहिए
भाजपा प्रदेश सचिव ने कहा कि हिमाचल प्रदेश का 7.19 प्रतिशत हिस्सा उसका वैधानिक अधिकार है। प्रदेश की भूमि, प्राकृतिक संसाधनों और जनता के हितों का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन हिमाचल के अधिकारों के मामले में कोई समझौता नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि बीबीएमबी मामले में मिली सफलता का श्रेय किसी एक सरकार या व्यक्ति को देने के बजाय सभी पूर्ववर्ती सरकारों के प्रयासों को भी स्वीकार किया जाना चाहिए।
follow us on facebook
subscribe to us on youtube