ग्रामीणों के अनुसार, सती होने से पहले महिला ने गांव को दिया था श्राप; आज भी घर-घर में स्थापित प्रतिमा की होती है पूजा
देशभर में दिवाली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। पर्व को लेकर लोग कई दिन पहले ही तैयारियां शुरू कर देते हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले के भोरंज क्षेत्र में स्थित सम्मू गांव की परंपरा इससे बिल्कुल अलग है।
यहां वर्षों से दिवाली का त्योहार नहीं मनाया जाता। ग्रामीणों के अनुसार, इसके पीछे एक महिला के सती होने से जुड़ी मान्यता और उसके द्वारा दिया गया श्राप है। गांव के लोग आज भी इस परंपरा को निभा रहे हैं।
सात पीढ़ियों तक दिवाली न मनाने का श्राप
गांव के निवासी सोनी कुमार ने बताया कि मान्यता के अनुसार, सतयुग के समय राजाओं की सेनाएं हुआ करती थीं। सम्मू गांव की एक महिला का पति भी सेना में सैनिक था। दिवाली के अवसर पर महिला अपने बेटे के साथ मायके जा रही थी।
इसी दौरान कुछ सैनिक वहां से सामान लेकर गुजर रहे थे। सैनिकों ने महिला से एक शहीद सैनिक के बारे में पूछा तो महिला ने उसे अपना पति बताया और उसका सामान वहीं रखने को कहा। इसके बाद महिला अपने बेटे और पति के सामान के साथ सती हो गई।
ग्रामीणों के अनुसार, सती होने से पहले महिला ने सम्मू गांव के लोगों को श्राप दिया था कि आने वाली सात पीढ़ियों तक कोई भी ग्रामीण दिवाली का त्योहार नहीं मनाएगा। तभी से गांव में दिवाली न मनाने की परंपरा चली आ रही है।
दिवाली मनाने की कोशिश पर हुईं अनहोनी की घटनाएं
गांव की उर्मिला ने बताया कि कुछ ग्रामीणों ने बीच में दिवाली मनाने की कोशिश की थी, लेकिन इस दौरान उनकी गौशालाओं में अचानक आग लगने की घटनाएं हुईं और सब कुछ जलकर राख हो गया। उनका कहना है कि जब भी कोई ग्रामीण दिवाली मनाने का प्रयास करता है तो किसी न किसी तरह की परेशानी या बीमारी का सामना करना पड़ता है। इसी मान्यता और भय के चलते गांव के लोग दिवाली नहीं मनाते।
घर-घर में स्थापित है सती हुई महिला की प्रतिमा
जगदीश चंद रंगड़ा ने बताया कि गांव के लगभग हर घर में सती हुई महिला की प्रतिमा स्थापित है। दिवाली के बाद ग्रामीण इन प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। उन्होंने बताया कि पूजा के दौरान यदि अचानक कोई मेहमान घर आ जाए तो ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार पूजा सफल नहीं मानी जाती और उसे दोबारा करना पड़ता है। आज भी गांव के लोग इस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
युवा पीढ़ी भी निभा रही है परंपरा
आधुनिक दौर में भी गांव के युवा अपने बुजुर्गों से चली आ रही इस परंपरा को निभा रहे हैं। गांव के युवा दिव्यांश ने बताया कि उनके लिए यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि बुजुर्गों से सुनी और पीढ़ियों से चली आ रही एक सच्ची घटना है। उन्होंने कहा कि गांव में सदियों से दिवाली नहीं मनाई जा रही है और युवा भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
इस तरह जहां देशभर में दिवाली पर घर रोशनी से जगमगाते हैं, वहीं हमीरपुर के सम्मू गांव में इस दिन भी सामान्य दिनचर्या रहती है। गांव के लोग दिवाली नहीं मनाते, लेकिन सती हुई महिला की प्रतिमा की पूजा कर अपनी पुरानी परंपरा का निर्वहन करते हैं।
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