दुर्गा अष्टमी से दीपावली तक करीब 20 दिनों तक निभाई जाती है परंपरा, बड़दैला के दिन होता है विधिवत समापन; आग के दहकते लकड़ी के गुच्छों को गोल-गोल घुमाकर खेलते हैं युवा
हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में लोक संस्कृति से जुड़ी एक अनूठी परंपरा ‘हुशू’ का आयोजन आज संपन्न होगा। आग की लपटों के बीच लकड़ियों के दहकते गुच्छों को गोल-गोल घुमाकर खेले जाने वाला यह पारंपरिक खेल ग्रामीण संस्कृति और सामूहिक उत्साह का प्रतीक है।
दुर्गा अष्टमी की रात से शुरू होकर दीपावली से एक दिन पहले तक चलने वाली यह परंपरा करीब 20 दिनों तक निभाई जाती है।
‘हुशू’ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हालांकि, आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव और नई पीढ़ी की पारंपरिक आयोजनों में कम भागीदारी के कारण यह अनूठा लोक खेल अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहा है।
अलाव जलाकर होती है हुशू की शुरुआत
इस पारंपरिक खेल की शुरुआत गांव के किसी खुले स्थान या पारंपरिक चौपाल में लकड़ियों का अलाव जलाकर की जाती है। स्थानीय भाषा में इस अलाव को ‘घैना’ कहा जाता है। घैना जलाने के बाद उसकी विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
इसके बाद तार से बांधकर तैयार किए गए लकड़ियों के गुच्छों को आग लगाई जाती है। आग से दहकते इन गुच्छों को गांव के युवा पारंपरिक अंदाज में गोल-गोल घुमाते हैं। इस दौरान स्थानीय बोली में लोकगीत भी गाए जाते हैं, जिससे पूरा वातावरण लोक संस्कृति और उत्साह से भर जाता है।
बड़दैला के दिन होता है परंपरा का समापन
हुशू का आयोजन सूर्यास्त के बाद संध्या काल में किया जाता है। गांव के युवा और अन्य ग्रामीण एक स्थान पर एकत्र होकर इस पारंपरिक खेल में हिस्सा लेते हैं। दुर्गा अष्टमी से शुरू होने वाला यह सिलसिला दीपावली से एक दिन पहले तक जारी रहता है।
परंपरा के अंतिम दिन को स्थानीय भाषा में ‘बड़दैला’ कहा जाता है। इस दिन गांव की चौपाल में पारंपरिक घैना जलाकर उसकी पूजा की जाती है। इस अवसर पर पारंपरिक व्यंजन, मूड़ा और अखरोट आदि अर्पित किए जाते हैं।
इन्हीं धार्मिक और सांस्कृतिक रस्मों के साथ हुशू का विधिवत समापन होता है। हालांकि, अलग-अलग गांवों में इस परंपरा को निभाने के तौर-तरीकों और नामों में भिन्नता भी देखने को मिलती है।
आधुनिकता के दौर में सिमट रही लोक संस्कृति की विरासत
पहाड़ी क्षेत्रों की यह विशिष्ट लोक परंपरा अब धीरे-धीरे सिमटती जा रही है। कभी गांव-गांव में उत्साह के साथ आयोजित होने वाला यह पारंपरिक खेल अब कुछ ही गांवों तक सीमित रह गया है। नई पीढ़ी का पारंपरिक आयोजनों से कम जुड़ाव और आधुनिक जीवनशैली का बढ़ता प्रभाव इसके अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहा है।
राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित शोधकर्ता एवं साहित्यकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी के अनुसार, हुशू जैसी लोक परंपराएं किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। इनके माध्यम से स्थानीय भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज और सामूहिक जीवनशैली एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती है।
ऐसे में इस विरासत को बचाने के लिए नई पीढ़ी को पारंपरिक आयोजनों से जोड़ने और इनका दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है।
आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी
दुर्गा अष्टमी से दीपावली तक चलने वाला हुशू का पारंपरिक आयोजन एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में लोक संस्कृति की अनूठी छटा बिखेर रहा है। हालांकि, इसके सीमित होते आयोजन चिंता का विषय हैं। जरूरत है कि आधुनिकता के साथ अपनी पुरातन परंपराओं को भी सहेजा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी आग के इस अनूठे खेल और इससे जुड़ी सांस्कृतिक विरासत से परिचित रह सकें।
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