छह माह से 18 वर्ष तक के बच्चों में बढ़ा खतरा, समय पर इंसुलिन और उपचार से रोकी जा सकती है गंभीर स्थिति
हिमाचल प्रदेश में बच्चों में टाइप-1 मधुमेह (Type-1 Diabetes) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। दीन दयाल उपाध्याय जोनल अस्पताल (डीडीयू), शिमला के बाल रोग विभाग की रिपोर्ट में छह माह से 18 वर्ष तक के बच्चों में इस बीमारी के मामलों में वृद्धि सामने आई है।
विशेषज्ञों के अनुसार टाइप-1 मधुमेह मुख्य रूप से शरीर की ऑटोइम्यून प्रणाली में गड़बड़ी के कारण विकसित होता है। इस स्थिति में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अग्न्याशय (Pancreas) की उन कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने लगती है, जो इंसुलिन का निर्माण करती हैं। इसके परिणामस्वरूप शरीर में इंसुलिन का उत्पादन कम या पूरी तरह बंद हो जाता है।
डॉक्टरों का कहना है कि टाइप-1 मधुमेह के लक्षण सभी बच्चों में एक जैसे दिखाई नहीं देते, लेकिन समय रहते पहचान न होने पर बीमारी गंभीर रूप ले सकती है। उपचार में देरी होने पर बच्चे डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (DKA) जैसी खतरनाक स्थिति का शिकार हो सकते हैं।
इस स्थिति में बच्चों को तेज और गहरी सांस लेना, उल्टी, पेट दर्द, अत्यधिक कमजोरी, थकान और कई बार बेहोशी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। विशेषज्ञों ने अभिभावकों से अपील की है कि बच्चों में दिखाई देने वाले शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।
डीडीयू अस्पताल में करीब 20 बच्चों का चल रहा फॉलो-अप
डीडीयू अस्पताल शिमला के पीडियाट्रिक विभाग ने अस्पताल में उपचार के लिए आने वाले बच्चों के मामलों का अध्ययन कर जुलाई 2026 में रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के अनुसार, विभाग वर्तमान में करीब 20 बच्चों का नियमित फॉलो-अप कर रहा है।
अध्ययन में पाया गया कि टाइप-1 मधुमेह से पीड़ित बच्चों को समय पर उपचार, नियमित जांच और चिकित्सकीय निगरानी उपलब्ध कराई जाए तो बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टरों के अनुसार नियमित इंसुलिन उपचार, परिवार की जागरूकता और लगातार फॉलो-अप से बच्चों को गंभीर जटिलताओं से बचाया जा सकता है।
टाइप-1 मधुमेह के प्रमुख लक्षण
विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों में टाइप-1 मधुमेह के दौरान निम्न लक्षण दिखाई दे सकते हैं—
तेजी से वजन कम होना
अत्यधिक कमजोरी और थकान
बार-बार भूख लगना
बार-बार पेशाब आना
बहुत अधिक प्यास लगना
बार-बार संक्रमण होना
इन लक्षणों को पहचानकर समय पर जांच कराना बेहद जरूरी है।
टाइप-2 मधुमेह आमतौर पर वयस्कों में अधिक देखा जाता है
डॉक्टरों के अनुसार टाइप-2 मधुमेह आमतौर पर वयस्कों और माता-पिता में अधिक पाया जाता है। यह बीमारी जीवनशैली, खानपान और अन्य कारणों से जुड़ी हो सकती है। इसका स्थायी इलाज नहीं होता, इसलिए मरीजों को बीमारी का पता चलने के बाद नियमित दवाइयां और चिकित्सकीय सलाह का पालन करना पड़ता है। कुछ मामलों में इंसुलिन की आवश्यकता भी पड़ सकती है।
समय पर पहचान से बच्चे जी सकते हैं सामान्य जीवन
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अंकुर धर्माणी, डीडीयू अस्पताल शिमला ने कहा कि टाइप-1 मधुमेह का मतलब जीवन का रुक जाना नहीं है। सही समय पर बीमारी की पहचान, नियमित इंसुलिन, उचित परामर्श और परिवार के सहयोग से बच्चे स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अभिभावकों को बच्चों में दिखाई देने वाले शुरुआती संकेतों पर ध्यान देना चाहिए। समय पर जांच और उपचार शुरू होने से बीमारी को नियंत्रित रखा जा सकता है और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव किया जा सकता है।
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