दुर्गा अष्टमी की रात से दीपावली से एक दिन पहले तक निभाई जाती है 20 दिनों की परंपरा, लकड़ियों के जलते बंडल घुमाकर लोकगीत गाते हैं युवा
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के राजगढ़ और पझोता क्षेत्र में लोक संस्कृति से जुड़ी पारंपरिक आग का खेल ‘हुशू’ 18 अक्टूबर की रात से शुरू हो गया है। दुर्गा अष्टमी की रात्रि से दीपावली से एक दिन पहले तक निभाई जाने वाली यह अनूठी परंपरा क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान मानी जाती है।
इसमें गांव के युवा लकड़ियों के जलते हुए बंडल को गोल-गोल घुमाते हैं और पारंपरिक गीतों के माध्यम से लोक संस्कृति को जीवंत रखते हैं। हालांकि, आधुनिकता के दौर में यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे सिमटती जा रही है।
राजगढ़-पझोता की सांस्कृतिक पहचान है हुशू
राजगढ़ और पझोता क्षेत्र में हुशू केवल आग से जुड़ा पारंपरिक खेल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक संस्कृति का प्रतीक भी है। दुर्गा अष्टमी की रात से शुरू होने वाली यह परंपरा दीपावली से एक दिन पहले तक निभाई जाती है।
इस दौरान शाम के समय गांव के युवा चौपाल या किसी खुले स्थान पर एकत्र होते हैं। लकड़ियों के बंडल को तार से बांधकर उसमें आग लगाई जाती है और फिर उसे गोल-गोल घुमाया जाता है। इस दौरान पारंपरिक लोकगीत भी गाए जाते हैं, जिससे गांव का वातावरण लोक संस्कृति के रंग में रंग जाता है।
‘बड़दैला’ के दिन होता है परंपरा का समापन
हुशू की परंपरा का समापन दीपावली से एक दिन पहले होता है। इस दिन को स्थानीय भाषा में ‘बड़दैला’ कहा जाता है। इस अवसर पर गांव की चौपाल में लकड़ियों का पारंपरिक अलाव जलाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘घैना’ कहा जाता है।
इसके बाद घैने की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पारंपरिक रीति के अनुसार इसमें मूड़ा, अखरोट और अन्य पारंपरिक खाद्य सामग्री अर्पित की जाती है। इस रस्म के साथ हुशू की परंपरा का समापन होता है।
आधुनिकता के दौर में सिमट रही लोक परंपरा
लोक संस्कृति विशेषज्ञ एवं साहित्यकार डॉ. जोगेंद्र हाब्बी के अनुसार, किसी भी क्षेत्र की पहचान वहां की लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों से होती है। राजगढ़-पझोता का हुशू भी ऐसी ही एक विशिष्ट परंपरा है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली और नई पीढ़ी की बदलती रुचियों के कारण अब पहले की तुलना में कम गांवों में इसका आयोजन देखने को मिलता है।
उन्होंने कहा कि इस परंपरा को संरक्षित करने के लिए युवा पीढ़ी को इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व से अवगत करवाना जरूरी है, ताकि क्षेत्र की इस विरासत को आगे बढ़ाया जा सके।
आग के खेल में सावधानी बरतना जरूरी
डॉ. जोगेंद्र हाब्बी ने हुशू की परंपरा निभाते समय सावधानी बरतने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह आग के साथ खेला जाने वाला पारंपरिक आयोजन है, इसलिए विशेष रूप से बच्चों को सतर्क रहने की जरूरत है।
राजगढ़-पझोता का हुशू आज भी सिरमौर की समृद्ध लोक संस्कृति की अनूठी झलक पेश करता है। इस परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं, ताकि आने वाले समय में भी क्षेत्र की यह विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान कायम रह सके।
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