दुर्गा अष्टमी पर ग्रामीणों ने निभाई सदियों पुरानी लोक परंपरा, सफेद फूलों से तैयार किए नर-मादा प्रतीक
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के राजगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में दुर्गा अष्टमी का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और श्रद्धा के साथ मनाया गया। स्थानीय बोली में आठयो के नाम से प्रसिद्ध इस पर्व पर धराड़ा–धराड़ी पूजा विशेष आकर्षण का केंद्र रही।
प्रकृति से जुड़ी इस अनूठी परंपरा के तहत ग्रामीणों ने सफेद फूलों से नर-मादा प्रतीक तैयार कर विधिवत पूजा-अर्चना की। आधुनिकता के दौर में भी इस पर्व के माध्यम से लोगों का अपनी लोक संस्कृति और पूर्वजों की मान्यताओं के प्रति जुड़ाव देखने को मिला।
सूर्योदय से पहले शुरू होती है पूजा की तैयारी
आठयो पर्व पर पूजा की तैयारियां सूर्योदय से पहले शुरू हो जाती हैं। ग्रामीण आसपास की घासनियों और प्राकृतिक स्थानों से सफेद रंग के फूल एकत्र करते हैं, जिन्हें स्थानीय बोली में भुआ या ध्याड़ी कहा जाता है।
इन फूलों से दो अलग-अलग गुच्छे तैयार किए जाते हैं। इनमें एक को धराड़ा यानी नर और दूसरे को धराड़ी यानी मादा का प्रतीक माना जाता है। इसके बाद दोनों प्रतीकों को पारंपरिक तरीके से सजाकर पूजा के लिए तैयार किया जाता है।
हलवा, गेहूं के मूड़े, अखरोट और घी से होती है पूजा
परंपरा के अनुसार, शाम को सूर्यास्त के समय धराड़ा–धराड़ी की पूजा की जाती है। इस दौरान कड़ाही यानी हलवा, गेहूं के मूड़े, अखरोट, गुड़ और देशी घी सहित पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। इसके बाद दाल-चावल का प्रसाद भी अर्पित किया जाता है।
पूजा संपन्न होने के बाद प्रतीकों को नजदीकी जल स्रोत तक ले जाने की परंपरा निभाई जाती है। कई क्षेत्रों में धराड़ा को वापस घर लाकर सुरक्षित रखा जाता है। वर्षभर देव कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इसे घर में सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
लोक संस्कृति के संरक्षण में विद्वानों का योगदान
सिरमौर की लोक संस्कृति, लोक साहित्य और पारंपरिक रीति-रिवाजों के संरक्षण में पद्मश्री विद्यानंद सरैक और राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित डॉ. जौग्रेंद्र हाब्बी जैसे विद्वानों का योगदान उल्लेखनीय रहा है। डॉ. जौग्रेंद्र हाब्बी साहित्यकार एवं लोक कलाकार हैं और सिरमौर की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत से जुड़े विषयों पर उनका योगदान महत्वपूर्ण माना जाता है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि आठयो जैसे पारंपरिक पर्व नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोक मान्यताओं और पूर्वजों की विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लोक परंपराओं से जुड़ी है हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान
राजगढ़ में आठयो पर्व के दौरान निभाई गई धराड़ा–धराड़ी पूजा और इसके साथ शुरू होने वाला पारंपरिक हूशू लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत को दर्शाता है। आधुनिकता के बीच भी ग्रामीण समाज में इन परंपराओं के प्रति आस्था और जुड़ाव बना हुआ है।
ऐसे पारंपरिक पर्वों का संरक्षण हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों तक लोक मान्यताओं एवं रीति-रिवाजों को पहुंचाने के लिए महत्वपूर्ण है।
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