नाहन
समाज में आज भी कई ऐसी रूढ़िवादी परंपराएं हैं जो महिलाओं को अंतिम संस्कारों से दूर रखती हैं, लेकिन सिरमौर जिले के नाहन में एक बेटी ने इन बेड़ियों को तोड़कर मानवता और संतान के धर्म की नई परिभाषा लिखी है।
डॉ. वाईएस परमार मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के मेडिसिन विभाग में तैनात डॉ. अनिकेता शर्मा ने अपनी माँ के निधन पर न केवल उन्हें कांधा दिया, बल्कि मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज भी निभाया।
शोक की घड़ी में बनीं परिवार का संबल
डॉ. अनिकेता की माता और राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला बिलासपुर की सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य बीना शर्मा (75) का शुक्रवार को निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं और नाहन में अपनी बेटी के साथ ही रह रही थीं।
दुख की इस विकट घड़ी में डॉ. अनिकेता ने खुद को टूटने नहीं दिया। उन्होंने नाहन के मोक्षधाम में उन तमाम रस्मों को पूरा किया, जो आमतौर पर पुरुष प्रधान समाज में बेटों द्वारा निभाई जाती हैं।
रूढ़ियों पर प्रहार: मोक्षधाम तक का सफर
हिमाचल के पहाड़ी समाज में मोक्षधाम (श्मशान घाट) तक महिलाओं का जाना आज भी विरल माना जाता है। लेकिन डॉ. अनिकेता ने इन रस्मों को पीछे छोड़ते हुए अपनी माँ की अंतिम यात्रा में शामिल होकर उन्हें विदा किया। जब एक माँ पालने-पोसने में बेटा-बेटी का फर्क नहीं करती, तो विदाई के वक्त यह अंतर क्यों? डॉ. अनिकेता का यह कदम समाज की संकुचित सोच के लिए एक कड़ा संदेश है।
समाज के लिए एक प्रेरणा
डॉ. अनिकेता के इस साहस की हर तरफ सराहना हो रही है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि बेटियां केवल घर की लक्ष्मी ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर वह कुलदीपक बनकर कुल की सभी जिम्मेदारियां निभाने में सक्षम हैं। उनका यह हौसला उन हजारों बेटियों के लिए प्रेरणा है जो अपनों की अंतिम विदाई में शामिल होने की इच्छा तो रखती हैं, लेकिन सामाजिक दबाव के कारण पीछे हट जाती हैं।