मंडी I
संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक साधना है और इस साधना को समाजसेवा में कैसे बदला जाता है, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं पुरानी मंडी की शुक्ला शर्मा। शिक्षा विभाग से प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी शुक्ला शर्मा का संगीत के प्रति मोह कम नहीं हुआ है।
आज वह अपने घर को 'गुरुकुल' बनाकर उन गरीब और जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त संगीत शिक्षा दे रही हैं, जो आर्थिक तंगी के कारण अपनी प्रतिभा को निखार नहीं पाते।
1946 में मंडी के समखेतर में जन्मी शुक्ला शर्मा को संगीत विरासत में मिला। उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता रेलुराम से प्राप्त की। 1966 में उन्होंने आकाशवाणी शिमला में एक 'कैजुअल आर्टिस्ट' के रूप में अपनी मधुर आवाज का जादू बिखेरा।
इसके बाद उन्होंने वल्लभ महाविद्यालय मंडी में संगीत प्राध्यापक के रूप में लंबी सेवाएं दीं। वर्ष 2003 में वह कुल्लू कॉलेज से प्राचार्य (Principal) के पद से सेवानिवृत्त हुईं।
अपने 40 वर्षों के शैक्षणिक और संगीत सफर में शुक्ला शर्मा ने हजारों युवाओं को तराशा है। उनके द्वारा सिखाए गए शिष्य आज कला, खेल और राजनीति के शिखर पर हैं। उनके प्रमुख शिष्यों में शामिल हैं लोक गायकी रविकांता कश्यप, शिक्षा जगत प्रो.
मीना वर्मा और प्रो. अनुपमा, राजनीति पूर्व मंत्री राम लाल ठाकुर, खेल प्रख्यात क्रिकेटर शक्ति सिंह, आध्यात्म कथा वाचक राजेंद्र शर्मा।
सेवानिवृत्ति के बाद जहां लोग आराम का रास्ता चुनते हैं, वहीं शुक्ला शर्मा ने समाज के वंचित वर्ग के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। उनके घर पर आज शास्त्रीय गायन और वादन की स्वर लहरियां गूंजती हैं।
शुक्ला शर्मा का यह समर्पण न केवल संगीत के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है, बल्कि समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी का भी प्रमाण है। वह आज के दौर में उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं जो अपनी कला और अनुभव को अगली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं।