एनआईटी हमीरपुर इन्क्यूबेशन सेंटर से मिली 4 लाख रुपये की इग्निशन ग्रांट, लैब परीक्षण सफल और पेटेंट प्रक्रिया जारी
हिमाचल प्रदेश की शोधार्थी कृतिका शर्मा ने ग्रीन एनर्जी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण नवाचार किया है। मंडी की रहने वाली कृतिका शर्मा ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से फलों, सब्जियों और वन अपशिष्ट से कम पानी की खपत में इथेनॉल तैयार किया जा सकता है।
यह तकनीक देश में ग्रीन फ्यूल को बढ़ावा देने के प्रयासों के बीच एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है। वर्तमान में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों पर निर्भरता अधिक है, लेकिन इन फसलों में पानी की भारी खपत एक बड़ी चुनौती है।
कृतिका शर्मा की विकसित तकनीक कृषि और वन अपशिष्ट को उपयोगी ईंधन में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
एनआईटी हमीरपुर से मिला 4 लाख का सहयोग
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से पीएचडी कर चुकी कृतिका शर्मा के इस शोध को एनआईटी हमीरपुर के इन्क्यूबेशन सेंटर ने समर्थन दिया है। इस परियोजना के लिए सेंटर की ओर से 4 लाख रुपये की इग्निशन ग्रांट प्रदान की गई है।
इस परियोजना में पालमपुर की एमबीए अंजलि देवी भी सहयोगी के रूप में काम कर रही हैं।
कम पानी में तैयार होगा इथेनॉल
ग्रीन केमिकल आधारित इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें पारंपरिक तरीकों की तुलना में पानी की खपत काफी कम होती है।
लैब स्तर पर तैयार किए गए इथेनॉल की लागत करीब 60 रुपये प्रति लीटर आई है। अब शोध टीम का लक्ष्य इसे व्यावसायिक स्तर पर घटाकर करीब 40 रुपये प्रति लीटर तक लाना है।
परियोजना में पानी के पुनर्चक्रण के लिए ट्रीटमेंट प्लांट की व्यवस्था भी प्रस्तावित है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया को अधिक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकेगा।
पेटेंट के लिए आवेदन, सत्यापन प्रक्रिया जारी
कृतिका शर्मा ने बताया कि तकनीक का लैब स्तर पर सफल परीक्षण पूरा हो चुका है। इसके बाद पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है और वर्तमान में सत्यापन प्रक्रिया जारी है।
उन्होंने कहा कि यह तकनीक केवल वाहनों के लिए स्वच्छ ईंधन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उद्योगों में हरित ऊर्जा के विकल्प के रूप में भी उपयोगी साबित हो सकती है।
वेस्ट टू वेल्थ को मिलेगा बढ़ावा
एनआईटी हमीरपुर इन्क्यूबेशन सेंटर की इंचार्ज डॉ. पमिता अवस्थी ने कहा कि इथेनॉल उत्पादन के लिए केवल गन्ने और अन्य कृषि फसलों पर निर्भर रहने के बजाय अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग अधिक टिकाऊ विकल्प है।
उन्होंने कहा कि इस तकनीक से वेस्ट टू वेल्थ, पर्यावरण संरक्षण और ग्रीन एनर्जी को नई दिशा मिल सकती है।
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