शिमला।
हिमाचल प्रदेश की महत्वाकांक्षी 'मुख्यमंत्री सहारा योजना' इन दिनों गहन जांच के घेरे में है। योजना में कथित अनियमितताओं और अपात्र लाभार्थियों के शामिल होने की शिकायतों के बाद प्रदेश सरकार ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है।
इस पूरे मामले पर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धनीराम शांडिल ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि सरकार का उद्देश्य योजना को बंद करना नहीं, बल्कि इसे अधिक पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है।
स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि कई ऐसे लोग भी योजना का लाभ उठा रहे हैं जो इसके मापदंडों को पूरा नहीं करते। उन्होंने कहा, "सहारा योजना गंभीर बीमारियों जैसे कैंसर, पैरालिसिस, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी और थैलेसीमिया से जूझ रहे आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए है।
लेकिन रिकॉर्ड की समीक्षा के दौरान कुछ जिलों में लाभार्थियों की संख्या में असामान्य वृद्धि देखी गई है, जिसकी ऑडिट करवाई जा रही है।"
अब हर लाभार्थी का स्थानीय स्तर पर ऑडिट और भौतिक सत्यापन किया जाएगा। इसके लिए जिला स्तर पर कमेटियां गठित की गई हैं। सहारा योजना के लाभार्थियों को अब 'हिम परिवार पोर्टल' से जोड़ा जा रहा है, ताकि डेटा का दोहराव न हो और पारदर्शिता बनी रहे।
मंत्री ने स्वीकार किया कि कुछ तकनीकी कारणों और दस्तावेजों के नवीनीकरण (Verification) न होने की वजह से भुगतान में देरी हुई है, जिसे जल्द ही सुचारू कर दिया जाएगा। यदि जांच में किसी विभाग के अधिकारी या व्यक्ति की मिलीभगत से गलत तरीके से लाभ लेने की बात पुख्ता होती है, तो उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
विपक्ष द्वारा योजना को बंद करने के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए डॉ. शांडिल ने कहा कि सरकार मानवीय दृष्टिकोण के साथ काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में सरकार का संकल्प है कि ₹3,000 की यह मासिक सहायता राशि केवल उन असली हकदारों तक पहुंचे, जिन्हें वास्तव में दवाइयों और देखभाल के लिए इसकी जरूरत है।
प्रशासन ने लाभार्थियों से अपील की है कि वे समय पर अपने लाइफ सर्टिफिकेट (Life Certificate) और बीमारी से संबंधित मेडिकल प्रमाणपत्र अपडेट करवाएं, ताकि पेंशन जारी करने में कोई बाधा न आए।