शिमला
हिमाचल प्रदेश की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार और संसाधनों के बेहतर तालमेल के लिए एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है। राज्य सरकार ने उन 10 सरकारी डिग्री कॉलेजों को बंद कर दूसरे संस्थानों में मर्ज (विलय) करने के आदेश जारी किए हैं, जिनमें विद्यार्थियों की कुल संख्या 75 से कम है।
इसके साथ ही, दूसरे और तीसरे वर्ष के छात्रों पर इस फैसले से कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े, इसके लिए सरकार ने उन्हें हर महीने 5,000 रुपये का स्टाइपेंड (वजीफा) देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। उच्चतर शिक्षा विभाग के निदेशक डॉ. हरीश कुमार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है।
नए शैक्षणिक सत्र से दाखिलों पर रोक, इन 10 कॉलेजों का अस्तित्व होगा खत्म
सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, शैक्षणिक सत्र 2026-27 से इन प्रभावित कॉलेजों में प्रथम वर्ष सहित किसी भी कक्षा में नए प्रवेश (Admissions) नहीं होंगे। जिन 10 डिग्री कॉलेजों को बंद कर मर्ज किया गया है, उनमें टिक्कर, भलेई, कुकुमसेरी, कुपवी, संधोल, मुल्थान, जैनगर,
ननखड़ी, रोनहाट और कोटली डिग्री कॉलेज शामिल हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि घोषित 5,000 रुपये मासिक स्टाइपेंड की सुविधा केवल उन्हीं छात्रों को मिलेगी, जो सरकार द्वारा तय किए गए नए निर्धारित (मर्ज्ड) कॉलेजों में दाखिला लेंगे और अपनी मर्जी से किसी अन्य कॉलेज का चयन करने पर यह वित्तीय सहायता नहीं दी जाएगी।
प्राचार्यों को काउंसलिंग के निर्देश, लाहौल-स्पीति के कुकुमसेरी कॉलेज पर सबसे ज्यादा असर
उच्च शिक्षा निदेशक डॉ. हरीश कुमार ने सभी संबंधित कॉलेजों के प्राचार्यों (Principals) को दूसरे और तीसरे वर्ष के विद्यार्थियों की विशेष काउंसलिंग करने के निर्देश दिए हैं, ताकि उन्हें नए संस्थानों में प्रवेश, विषयों के चयन और अन्य शैक्षणिक प्रक्रियाओं की सटीक जानकारी मिल सके।
इस फैसले का सबसे बड़ा असर लाहौल-स्पीति जिले के कुकुमसेरी कॉलेज के छात्रों पर पड़ेगा, जिन्हें अब आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए कुल्लू जाना होगा। इसके अलावा, बंद हो रहे इन कॉलेजों के लिए करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित शानदार सरकारी भवनों और आधारभूत ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) के भविष्य के उपयोग को लेकर भी अब गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
एक साल से अटका था सरकार का यह फैसला, खर्च और दूरी को लेकर विरोध शुरू
उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने यह निर्णय पिछले वर्ष ही ले लिया था, लेकिन तब सत्र (Session) बीच में होने के कारण इसका भारी विरोध हुआ था और कानूनी अड़चनों से बचने के लिए इसे टाल दिया गया था, जिसे अब नए सत्र की शुरुआत में लागू किया गया है।
जहाँ सरकार का तर्क है कि यह कदम संसाधनों के बेहतर उपयोग और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए उठाया गया है; वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर इसका विरोध भी शुरू हो गया है।
लोगों का कहना है कि जो छात्र अब तक अपने घर के नजदीक पढ़ रहे थे, उन्हें अब दूर जिला मुख्यालयों तक जाना होगा, जिससे उनका रहने, खाने और परिवहन का खर्च बढ़ेगा, जिसकी भरपाई केवल ₹5000 के स्टाइपेंड से होना मुश्किल है।