दलबदल पर वार या सियासी बदला? पेंशन बंद करने वाला बिल पास, सदन में घमासान

 दलबदल पर वार या सियासी बदला? पेंशन बंद करने वाला बिल पास, सदन में घमासान
दलबदल पर वार या सियासी बदला? पेंशन बंद करने वाला बिल पास, सदन में घमासान

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शिमला:

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री Sukhvinder Singh Sukhu सरकार ने दलबदल पर बड़ा वार करते हुए ‘हिमाचल प्रदेश विधानसभा (सदस्यों के भत्ते और पेंशन) संशोधन विधेयक, 2026’ को विपक्ष के कड़े विरोध के बीच सदन से पारित करवा दिया, जिसके तहत अब संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित होने वाले विधायकों

को पेंशन नहीं मिलेगी, सरकार ने इसे लोकतंत्र बचाने का कदम बताया तो विपक्ष ने इसे सीधा-सीधा राजनीतिक बदले की कार्रवाई करार दिया।

मुख्यमंत्री सुक्खू ने सदन में साफ कहा कि मौजूदा कानून में दलबदल रोकने का कोई असरदार प्रावधान नहीं था, इसलिए यह संशोधन लाया गया है ताकि जनादेश की रक्षा हो सके और लोकतंत्र को बिकने से बचाया जा सके, उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि इस बिल का विरोध कर विपक्ष “ऑपरेशन लोटस” को बढ़ावा देना चाहता है,

जबकि सरकार दलबदल की राजनीति पर लगाम लगाने के लिए प्रतिबद्ध है।

वहीं नेता प्रतिपक्ष Jai Ram Thakur ने सरकार पर पलटवार करते हुए आरोप लगाया कि यह बिल लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए नहीं बल्कि चुनिंदा नेताओं को टारगेट करने के लिए लाया गया है, उन्होंने कहा कि पहले सभी विधायकों की पेंशन खत्म करने का प्रस्ताव लाया गया था जो पास नहीं हुआ,

अब दो विधायकों को निशाना बनाकर कानून बनाया जा रहा है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ है और यह मामला कोर्ट तक जाएगा, जहां सरकार को जवाब देना पड़ेगा।

इस पूरे विवाद के बीच विधानसभा अध्यक्ष Kuldeep Singh Pathania ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए कहा कि इस तरह का कानून देश के अन्य राज्यों के लिए मिसाल बनेगा और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजबूत होगी, लेकिन विपक्ष इस तर्क से पूरी तरह असहमत नजर आया।

बिल के पारित होते ही इसका सीधा असर गगरेट से पूर्व विधायक चैतन्य शर्मा और कुटलैहड़ से पूर्व विधायक देवेंद्र कुमार भुट्टो पर पड़ेगा, जिन पर फरवरी 2024 में राज्यसभा चुनाव के दौरान क्रॉस वोटिंग और पार्टी व्हिप के उल्लंघन के आरोप लगे थे, अब उनकी पेंशन भी बंद हो जाएगी,

जबकि अब तक नियमों के अनुसार पांच साल तक विधायक रहने पर पेंशन मिलती रही है। कुल मिलाकर, यह बिल हिमाचल की राजनीति में नई बहस छेड़ गया है! क्या यह सच में दलबदल पर लगाम है या फिर सियासी हिसाब-किताब का नया हथियार, इसका जवाब आने वाले समय में अदालत और राजनीति दोनों में देखने को मिलेगा।

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