शिमला ।
हिमाचल प्रदेश के बदलते परिवेश और वातावरणीय कारकों के कारण अब कम उम्र के बच्चे भी सांस संबंधी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में 6 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों में अस्थमा (दमा) के मामलों में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है।
खेलने-कूदने की इस उम्र में बच्चों का अस्थमा का शिकार होना चिंता का विषय है, क्योंकि इसके लक्षण वयस्कों की तुलना में काफी अलग और जटिल होते हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं मामले? बदलता मौसम और प्रदूषण मुख्य कारण
स्वास्थ्य विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि पहले अस्थमा के मामले मुख्य रूप से सर्दियों और धुंध के दौरान बढ़ते थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। बदलते मौसम, सूखे की स्थिति, हवा में मौजूद पोलन (पराग कण) और धूल-मिट्टी के कारण अब हर मौसम में मरीज बढ़ रहे हैं।
पूर्व रजिस्ट्रार आईजीएमसी एवं डीडीयू अस्पताल के विशेषज्ञ डॉ. अंकुर धर्माणी ने बताया कि वातावरणीय बदलावों के अलावा यह बीमारी पीढ़ी दर पीढ़ी (अनुवांशिक) भी चलती है।
बच्चों में अलग हैं लक्षण: थकान और जकड़न पर रखें नजर
बच्चों में अस्थमा के लक्षण वयस्कों की तरह स्पष्ट न होकर सूक्ष्म हो सकते हैं। यदि बच्चा सामान्य शारीरिक गतिविधियों से बचने लगे या खेलते समय जल्दी थक जाए, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। मुख्य लक्षणों में सुबह और रात के समय खांसी का बढ़ना, सांस लेते समय घरघराहट (Wheezing) की आवाज आना, सीने में जकड़न और श्वसन तंत्र में सूजन शामिल है।
खान-पान और परहेज है बेहद जरूरी
अस्थमा के प्रबंधन में आहार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ खास खाद्य पदार्थ जैसे दूध, अंडे, मूंगफली, गेहूं और सोया बच्चों में एलर्जी और अस्थमा के लक्षणों को ट्रिगर कर सकते हैं।
इसके अलावा, अधिक नमक और शक्कर का सेवन भी श्वसन मार्ग में समस्या पैदा कर सकता है। यदि बच्चे को किसी विशेष खाद्य पदार्थ से एलर्जी है, तो उसे तुरंत डाइट से हटा देना चाहिए।
बचाव और उपचार: जीवनशैली में बदलाव की जरूरत
डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों में अस्थमा का प्रभावी इलाज केवल दवाइयों से नहीं, बल्कि आहार और वातावरणीय नियंत्रण के संयोजन से ही संभव है। घर के अंदर धूल-मिट्टी कम रखने, एलर्जी पैदा करने वाली चीजों से दूरी बनाने और समय पर इनहेलर या दवाइयों के उपयोग से स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
समय पर पहचान और विशेषज्ञ की सलाह बच्चों को एक सामान्य जीवन जीने में मदद कर सकती है।