6 सितंबर का दिन बिलासपुर के लिए गौरव और भावुकता से भरा हुआ है। वर्ष 1965 में इसी दिन भारत-पाक युद्ध के दौरान बिलासपुर जिले के मलयावर गांव के वीर सपूत सिपाही सुख राम ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था।
उनकी शहादत दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में सदर विधायक भी मौजूद रहे और उन्होंने वीर सिपाही सुख राम को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके बलिदान को याद किया।
मलयावर गांव में हुआ था जन्म
वीर सिपाही सुख राम का जन्म 26 नवंबर 1938 को बिलासपुर जिले के मलयावर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम लखु राम था। बचपन से ही मेहनती और अनुशासित सुख राम पारंपरिक कुश्ती के लिए भी जाने जाते थे। 26 नवंबर 1959 को वह भारतीय सेना में भर्ती हुए और 3 डोगरा रेजिमेंट में अपनी सैन्य सेवाएं शुरू कीं।
ऑपरेशन फौलाद में दिखाया अदम्य साहस
वर्ष 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 3 डोगरा बटालियन को जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में महत्वपूर्ण सैन्य अभियान में तैनात किया गया था। ऑपरेशन फौलाद के दौरान भारतीय जवानों को दुश्मन की मजबूत चौकियों और भारी गोलीबारी का सामना करना पड़ा।
प्वाइंट 7702 की ओर बढ़ते समय दुश्मन की एलएमजी चौकियां भारतीय सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई थीं। इसी दौरान सिपाही सुख राम ने अदम्य साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने साथियों को आगे बढ़ने का रास्ता देने के लिए दुश्मन की चौकियों को निष्क्रिय करने का साहसिक प्रयास किया।
इस कार्रवाई के दौरान सिपाही सुख राम गंभीर रूप से घायल हो गए और 6 सितंबर 1965 को वीरगति को प्राप्त हुए।
मरणोपरांत वीर चक्र से हुए सम्मानित
मातृभूमि की रक्षा के लिए सिपाही सुख राम के अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
शहादत दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए सदर विधायक ने कहा कि देश की रक्षा के लिए वीर सपूत सुख राम का बलिदान हमेशा याद रखा जाएगा। उनकी वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर जवानों का बलिदान राष्ट्र कभी नहीं भूल सकता। वीर सिपाही सुख राम की शहादत बिलासपुर ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के लिए गर्व का विषय है।
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