पंडोह हादसे के बाद सात दिन से लापता था परिवार का इकलौता सहारा, तेज बहाव कई किलोमीटर दूर धर्मपुर के कांडापतन ले गया शव
सात दिन तक बूढ़ी मां की आंखें बेटे के लौटने की राह देखती रहीं। पत्नी को आखिरी पल तक उम्मीद थी कि शायद कोई चमत्कार हो और रमेश कुमार सकुशल घर लौट आए। दो छोटे बच्चे भी पिता के आने का इंतजार कर रहे थे।
लेकिन लाहौल से सब्जियां लेकर पंजाब जा रहे परिवार के इकलौते सहारे की तलाश बुधवार को उस समय खत्म हो गई, जब उनका शव धर्मपुर क्षेत्र के कांडापतन में व्यास नदी किनारे बरामद हुआ।
पंडोह के छह मील के पास हादसे के बाद रमेश कुमार व्यास नदी में लापता हो गए थे। घटना के बाद से प्रशासन, पुलिस, गोताखोरों और स्थानीय लोगों की टीमें पंडोह बांध के आसपास लगातार सर्च ऑपरेशन चला रही थीं।
सात दिनों तक नदी के अलग-अलग हिस्सों में उनकी तलाश की गई। इसी बीच मंगलवार को पंडोह डैम के पास गोताखोरों को रमेश की दुर्घटनाग्रस्त पिकअप जीप मिलने की सूचना मिली थी। जीप के अंदर रमेश के होने की चर्चा भी सामने आई, लेकिन बुधवार को दोबारा तलाश करने पर न तो जीप वहां मिली और न ही रमेश का शव। इसके बाद सर्च ऑपरेशन और तेज कर दिया गया।
तेज बहाव कई किलोमीटर दूर ले गया शव
विडंबना यह रही कि जिस स्थान के आसपास सर्च टीमें लगातार रमेश की तलाश कर रही थीं, तेज बहाव उनके शव को कई किलोमीटर दूर धर्मपुर के कांडापतन तक ले गया। नीलकंठ महादेव लघु हरिद्वार कांडापतन के पास व्यास नदी किनारे एक अज्ञात शव मिलने की सूचना पुलिस को मिली।
मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लिया और परिजनों को सूचना दी। परिजनों के पहुंचने पर शव की पहचान रमेश कुमार के रूप में हुई।
रमेश कुमार अपनी पिकअप जीप में लाहौल से सब्जियां लेकर पंजाब के लिए निकले थे। यही उनका रोजगार था और इसी काम से उनके परिवार की आजीविका चलती थी। छह मील के पास हुए हादसे में पिकअप जीप व्यास नदी में जा गिरी और रमेश नदी के तेज बहाव में लापता हो गए। उनके अचानक चले जाने से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है।
सात दिन उम्मीद में गुजरे, अब परिवार के सामने भविष्य की चिंता
रमेश के लापता होने के बाद से उनके परिवार के लिए सात दिन उम्मीद और बेचैनी के बीच गुजरे। बूढ़ी मां को भरोसा था कि बेटा जरूर लौटेगा। पत्नी भी आखिरी समय तक किसी चमत्कार की उम्मीद लगाए बैठी थी। दो छोटे बच्चे शायद अभी यह समझ भी नहीं पा रहे थे कि जिस पिता के लौटने की राह वे देख रहे हैं, वह अब कभी वापस नहीं आएंगे।
रमेश परिवार के इकलौते सहारे थे। लाहौल से सब्जियां पंजाब तक पहुंचाने के काम से ही घर का खर्च चलता था। अब उनके निधन के बाद बूढ़ी मां, पत्नी और दो मासूम बच्चों के सामने भविष्य की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। सात दिनों से जिस घर में बेटे और पिता के लौटने की उम्मीद थी, वहां अब इंतजार तो खत्म हो गया है, लेकिन परिवार के लिए संघर्ष का एक नया दौर शुरू हो गया है।
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