ऑपरेशन विजय में 18 जुलाई 1999 को शहीद हुए थे सुनील कुमार, सड़क और स्कूल अपग्रेड की मांग पूरी हुई लेकिन स्मृति द्वार का इंतजार आज भी जारी।
कारगिल युद्ध में हिमाचल प्रदेश के वीर जवानों की शहादत देश कभी नहीं भूल सकता। जुलाई का महीना आते ही ऑपरेशन विजय के दौरान देश की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले वीर सैनिकों की यादें फिर ताजा हो जाती हैं।
इन्हीं वीर सपूतों में शामिल हैं हमीरपुर जिले के टनेकंड गांव निवासी अमर शहीद सुनील कुमार, जिन्होंने 18 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
शहीद सुनील कुमार की शहादत को करीब 27 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी उनके परिवार और ग्रामीण उनकी वीरता को गर्व और सम्मान के साथ याद करते हैं। हालांकि, उनकी स्मृति को स्थायी पहचान देने वाली गांव के प्रवेश द्वार के निर्माण की मांग अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
परिवार को बेटे की शहादत पर गर्व, लेकिन अधूरी मांग का मलाल
शहीद सुनील कुमार की छोटी बहन रेखा कुमारी ने बताया कि कारगिल जाने से पहले उनके भाई से बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा था कि युद्ध खत्म होने के बाद वह घर लौटेंगे और परिवार में होने वाली शादी में शामिल होंगे। लेकिन 18 जुलाई 1999 को शहादत की खबर ने पूरे परिवार को गहरा सदमा दिया।
उन्होंने बताया कि सुनील कुमार का व्यवहार बेहद मिलनसार था। छुट्टी पर आने के बाद वह गांव के हर व्यक्ति से मिलते थे और सभी से अपनापन रखते थे।
रेखा कुमारी ने कहा कि परिवार की मांग थी कि गांव में शहीद के नाम से एक प्रवेश द्वार बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को याद रख सकें। पहले एक गेट लगाया गया था, लेकिन बाद में वह क्षतिग्रस्त हो गया। अब परिवार ने सरकार और प्रशासन से दोबारा प्रवेश द्वार बनाने की मांग की है।
साथियों और ग्रामीणों ने भी रखी मांग
पूर्व सैनिक सूबेदार प्रवीण ठाकुर ने कहा कि शहीद सुनील कुमार का व्यक्तित्व बेहद प्रेरणादायक था। वह सभी का सम्मान करते थे और युवाओं को सेना में जाने के लिए प्रेरित करते थे।
उन्होंने बताया कि सुनील कुमार पहले 28 आरआर जम्मू में तैनात थे, जिसके बाद उन्हें कारगिल युद्ध क्षेत्र में भेजा गया, जहां उन्होंने देश के लिए बलिदान दिया।
सूबेदार प्रवीण ठाकुर ने कहा कि वर्षों से उनकी स्मृति में प्रवेश द्वार बनाने की मांग की जा रही है, जिसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए।
वहीं स्थानीय निवासी सूबेदार प्रेमलाल चंदेल ने बताया कि गांव की मुख्य मांगों में सड़क और प्रवेश द्वार शामिल थे। सड़क निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है और स्कूल भी अपग्रेड हो गया है, लेकिन प्रवेश द्वार की मांग अभी बाकी है।
उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर स्थानीय विधायक से भी बात की गई थी और उन्होंने मांग को पूरा करने का आश्वासन दिया था।
परिवार ने कहा- शहादत पर गर्व, कमी कभी पूरी नहीं होगी
शहीद के भाई मेहर चंद ने कहा कि उन्हें अपने भाई की शहादत पर गर्व है, लेकिन उनकी कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि सुनील कुमार करीब 20 वर्ष की उम्र में सेना में भर्ती हुए थे और 24 वर्ष की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए।
उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण और स्कूल अपग्रेड जैसी मांगें पूरी हो चुकी हैं, अब केवल प्रवेश द्वार का निर्माण बाकी है। यदि सरकार यह मांग पूरी कर देती है तो यह शहीद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
प्रशासन ने दिया जल्द कार्रवाई का आश्वासन
इस मामले पर उपायुक्त हमीरपुर गंधर्वा राठौड़ ने कहा कि कारगिल युद्ध के शहीद देश का गौरव और प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि परिवार की प्रवेश द्वार बनाने की मांग को संबंधित विभाग के माध्यम से आगे बढ़ाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि गांव में उपयुक्त भूमि चिन्हित की जाएगी और फंड की आवश्यकता को सरकार के समक्ष रखा जाएगा। प्रशासन शहीद परिवार के साथ है और उनकी समस्या के समाधान के लिए हरसंभव सहायता करेगा।
27 साल बाद भी इंतजार जारी
कारगिल युद्ध को लगभग 27 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन शहीद सुनील कुमार की स्मृति में प्रवेश द्वार बनाने की मांग अभी भी अधूरी है। टनेकंड गांव के लोग चाहते हैं कि यह प्रवेश द्वार जल्द बने, ताकि गांव की पहचान देश के वीर सपूत सुनील कुमार के नाम से जुड़ सके और आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान से प्रेरणा ले सकें।
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