शिमला
हिमाचल प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य सरकार द्वारा चयनित सरकारी स्कूलों को सीबीएसई (CBSE) से संबद्ध करने के फैसले के बाद अभिभावकों का रुझान निजी स्कूलों से हटकर सरकारी संस्थानों की ओर बढ़ा है।
लेकिन इस बीच कई निजी स्कूलों द्वारा छात्रों का स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (SLC) रोकने के मामले सामने आए हैं, जिस पर शिक्षा विभाग ने अब कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है।
शिक्षा विभाग को लगातार मिल रही शिकायतों के बाद शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि यदि कोई निजी स्कूल छात्र का SLC या ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) रोकता है, तो उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाए।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि प्रमाण पत्र रोकने वाले स्कूलों की एनओसी (No Objection Certificate) रद्द की जा सकती है। यह कृत्य 'हिमाचल प्रदेश प्राइवेट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस (रेगुलेशन) एक्ट' के प्रावधानों का उल्लंघन है।
विभाग ने सरकारी स्कूल के प्रधानाचार्यों को निर्देश दिए हैं कि यदि किसी मामले में निजी स्कूल जानबूझकर SLC नहीं दे रहा है, तो छात्र को अस्थायी दाखिला दिया जाए ताकि उसकी पढ़ाई का नुकसान न हो।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी स्कूलों में दाखिले बढ़ने के तीन मुख्य कारण हैं। राज्य के 100 से अधिक स्कूलों को सीबीएसई से जोड़ना एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ है। मुख्यमंत्री सुक्खू के नेतृत्व में सरकारी स्कूलों को 'स्कूल ऑफ एक्सीलेंस' के रूप में विकसित किया जा रहा है।
निजी स्कूलों की बेतहाशा बढ़ती फीस और एनुअल चार्ज के बोझ से परेशान अभिभावक अब बेहतर गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
निजी स्कूल प्रबंधनों का कहना है कि वे केवल उन्हीं छात्रों का SLC रोक रहे हैं जिनकी फीस बकाया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट और आरटीई (RTE) एक्ट के तहत फीस के नाम पर छात्र का प्रमाण पत्र रोकना कानूनी रूप से गलत है।
शिक्षा विभाग ने सभी निजी संस्थानों को चेतावनी दी है कि वे छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करें। विभाग ने हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं जहाँ अभिभावक प्रमाण पत्र न मिलने की सूरत में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।