अदालत ने कहा- संयुक्त विवाह में सभी भाइयों की मृत्यु के बाद ही बच्चों को मिलेगा संपत्ति में मालिकाना हक
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों में प्रचलित रही बहुपति प्रथा के तहत संपत्ति उत्तराधिकार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संयुक्त विवाह व्यवस्था में एक भाई की मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति सीधे बच्चों के नाम हस्तांतरित नहीं होती, बल्कि जीवित भाई का उस पर अधिकार रहता है।
कोर्ट ने कहा कि जब संयुक्त विवाह में शामिल सभी भाइयों की मृत्यु हो जाती है, तभी अगली पीढ़ी यानी बच्चों को संपत्ति में मालिकाना हक या बंटवारे का कानूनी अधिकार प्राप्त होता है।
हाईकोर्ट ने खारिज की अपील
हाईकोर्ट ने करीब दो दशक पुराने दीवानी मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।
अदालत ने माना कि जिस समय एक भाई की मृत्यु हुई, उस समय उसका दूसरा भाई जीवित था। ऐसे में राजस्व विभाग की ओर से संपत्ति का इंतकाल जीवित भाई के नाम दर्ज करना वैध था और स्थानीय परंपराओं के अनुरूप था।
ऐतिहासिक दस्तावेजों को बनाया आधार
फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश राकेश कैंथला ने हिमाचल के पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों के इतिहास तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों का अध्ययन किया।
अदालत ने अपने निर्णय में दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया।
कोर्ट ने वर्ष 1910 के पंजाब स्टेट गैजेटियर का उल्लेख करते हुए कहा कि शिमला हिल्स और रोहड़ू तहसील के कई क्षेत्रों में बहुपति प्रथा प्रचलित रही है।
इस व्यवस्था का एक उद्देश्य जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटवारे को रोकना और संयुक्त परिवार की संपत्ति को बनाए रखना था।
अदालत ने हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डॉ. वाईएस परमार की वर्ष 1975 में प्रकाशित पुस्तक "पालीएंड्री इन हिमालयाज" का भी उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि संयुक्त विवाह व्यवस्था में पैदा हुए बच्चे पूरे परिवार के बच्चे माने जाते थे। जब तक परिवार के सभी पिता यानी भाई जीवित रहते थे, तब तक बच्चों को पिताविहीन नहीं माना जाता था।
क्या था पूरा मामला
यह मामला शिमला जिले की रोहड़ू तहसील के एक हिंदू संयुक्त परिवार से जुड़ा था। परिवार में दो भाइयों की एक ही पत्नी थी, यानी बहुपति प्रथा के तहत विवाह हुआ था।
एक भाई की मृत्यु वर्ष 1935 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने से पहले हो गई थी। इसके बाद राजस्व विभाग ने मृत भाई की संपत्ति का इंतकाल जीवित भाई के नाम दर्ज कर दिया।
बाद में मृतक भाई के पोतों ने इस इंतकाल और पारिवारिक बंटवारे को अदालत में चुनौती दी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मामला पारंपरिक मिताक्षरा हिंदू कानून के तहत आता है और वे अपने दादा की संपत्ति के एकमात्र कानूनी उत्तराधिकारी हैं।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और स्थानीय परंपरा तथा ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जीवित भाई के अधिकार को मान्यता दी।
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