डूबलु पंचायत के लोगों ने 10-12 साल के संघर्ष के बाद खुद जुटाए संसाधन, दो पंचायतों के बीच 40-45 किलोमीटर की दूरी घटकर रह गई 7 किलोमीटर
ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के दावों के बीच डूबलु पंचायत के लोगों ने सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए खुद ही पहल की है। करीब 10 से 12 साल तक सरकारी स्तर पर सड़क निर्माण का इंतजार करने और संघर्ष करने के बाद ग्रामीणों ने अपने संसाधनों और निजी खर्च से सड़क का निर्माण पूरा कर दिया।
इस कार्य में भाजपा जिला उपाध्यक्ष मोहित ठाकुर ने भी अपनी ओर से 2 लाख रुपये का आर्थिक सहयोग दिया।
इस सड़क के बनने से दो पंचायतों के बीच की दूरी 40 से 45 किलोमीटर से घटकर महज 7 किलोमीटर रह गई है। इससे पयुरन, ब्लॉक पंचायत के साथ ट्राई, लखोठी और छलांडा के लोगों को भी सीधा लाभ मिलेगा।
मंत्री अनिरुद्ध सिंह पर मोहित ठाकुर ने उठाए सवाल
भाजपा जिला उपाध्यक्ष मोहित ठाकुर ने इस मामले को लेकर कैबिनेट मंत्री अनिरुद्ध सिंह पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के लोगों ने 14 साल तक विधायक और चार साल से मंत्री रहे जनप्रतिनिधि से सड़क जैसी मूलभूत सुविधा की उम्मीद की, लेकिन उन्हें खुद सड़क बनाने के लिए आगे आना पड़ा।
मोहित ठाकुर ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में विकास कार्यों के बजाय मंत्री अपने करीबियों और निजी ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने में लगे हैं। उन्होंने कोटी में कॉलेज के अलावा अन्य पंचायतों में उच्च शिक्षा की सुविधाओं के विस्तार को लेकर भी सवाल उठाए।
कानूनी और सरकारी अड़चनों के बाद ग्रामीणों ने जुटाए संसाधन
स्थानीय निवासी योगेंद्र शर्मा ने बताया कि दो पंचायतों को जोड़ने वाली इस सड़क के निर्माण के लिए ग्रामीणों को लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा। इस दौरान कई कानूनी और सरकारी अड़चनें भी आईं, लेकिन लोगों ने प्रयास जारी रखे। आखिरकार सभी के सहयोग से सड़क का निर्माण पूरा हो पाया।
वहीं, स्थानीय निवासी महेशिंद्र सिंह के अनुसार, सड़क का काम करीब 10 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन पुपलोरा के पास आकर रुक गया। बजट की कमी और वन अधिकार अधिनियम (FRA) से जुड़ी अनुमति जैसी अड़चनों के कारण निर्माण आगे नहीं बढ़ पाया। इसके बाद ग्रामीणों ने खुद संसाधन जुटाए और कंप्रेसर व ब्रेकर मशीनों की मदद से सड़क को जोड़ने का काम पूरा किया।
अब इस सड़क के तैयार होने से आसपास की पंचायतों के लोगों को आवागमन में बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, ग्रामीणों को सड़क के लिए खुद संसाधन जुटाने की नौबत क्यों आई, इस मामले ने जनप्रतिनिधियों और सरकारी व्यवस्था की जिम्मेदारी पर सवाल खड़े किए हैं।
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