सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित कमेटी ने धर्मशाला में की प्रारंभिक बैठक, फोरलेन-टनल निर्माण और पेड़ों की कटाई पर भी मंथन
हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती विकासात्मक गतिविधियों और पर्यटन के बढ़ते दबाव के बीच पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने, पेड़ों की कटाई और निर्माण परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर गठित सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) ने हिमाचल प्रदेश में पर्यावरणीय प्रभावों की समीक्षा शुरू कर दी है।
CEC ने धर्मशाला में प्रदेश के संबंधित विभागों के अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ प्रारंभिक बैठक कर विभिन्न पर्यावरणीय पहलुओं पर चर्चा की। कमेटी इन चर्चाओं और विशेषज्ञों से मिले सुझावों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी।
CEC सदस्य डॉ. सतीश गड़कोटी ने बताया कि प्रारंभिक बैठक में करीब नौ महत्वपूर्ण पर्यावरणीय पहलुओं को शामिल किया गया है। संबंधित विभागों के अधिकारियों और विशेषज्ञ सदस्यों के साथ विचार-विमर्श के बाद कमेटी निष्कर्षात्मक रिपोर्ट तैयार करेगी और आवश्यक सिफारिशें देगी।
उन्होंने बताया कि मानसून अवधि को देखते हुए कमेटी ने अतिरिक्त समय की मांग की थी, जिसके बाद उसे छह सप्ताह का समय मिला है। हालांकि, पर्यावरण से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों को देखते हुए कमेटी की कोशिश है कि रिपोर्ट जल्द तैयार कर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
ग्लेशियरों का पिघलना बड़ी चिंता
डॉ. सतीश गड़कोटी ने कहा कि ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना केवल हिमाचल प्रदेश या भारत की समस्या नहीं है, बल्कि यह वैश्विक चिंता का विषय है। हिमालयी क्षेत्र में सामने आ रहे घटनाक्रम इस खतरे की गंभीरता को दर्शाते हैं।
उन्होंने कहा कि कमेटी की प्राथमिकताओं में ग्लेशियरों और जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। रिपोर्ट में इन विषयों को लेकर आवश्यक सुझाव और सिफारिशें दिए जाएंगे।
सिर्फ पौधरोपण नहीं, पौधों का बचना भी जरूरी
फोरलेन, टनल और अन्य निर्माण परियोजनाओं के दौरान होने वाली पेड़ों की कटाई और उसके बदले किए जाने वाले पौधरोपण पर भी कमेटी ने चर्चा की। डॉ. गड़कोटी ने कहा कि देश में प्रतिपूरक पौधरोपण और वनीकरण का प्रावधान है, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती लगाए गए पौधों की सर्वाइवल रेट है।
उन्होंने कहा कि केवल पौधरोपण का लक्ष्य पूरा करना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि लगाए गए पौधों की नियमित निगरानी की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे जीवित रहें और उनका विकास हो।
पर्यावरणीय मंजूरियों के बाद मॉनिटरिंग पर जोर
CEC सदस्य ने कहा कि पर्यावरणीय मंजूरियां देने के बाद उनकी प्रभावी निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है। यदि पर्यावरणीय मंजूरियों की शर्तों की नियमित निगरानी हो तो कई पर्यावरणीय समस्याओं को समय रहते नियंत्रित किया जा सकता है।
पर्यटन स्थलों की कैरिंग कैपेसिटी तय करने की जरूरत
हिमाचल के पर्यटन स्थलों पर बढ़ते वाहनों के दबाव को लेकर भी कमेटी ने चिंता जताई है। डॉ. गड़कोटी ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों की सड़कों और बुनियादी ढांचे की अपनी एक कैरिंग कैपेसिटी होती है। इसलिए यह निर्धारित करना जरूरी है कि किसी पर्यटन स्थल पर कितने वाहनों का दबाव पर्यावरण और उपलब्ध बुनियादी ढांचे के लिहाज से उचित है।
उन्होंने कहा कि पूरा हिमालय एक संवेदनशील क्षेत्र है और इसे केवल हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड या जम्मू-कश्मीर तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। हिमालयी क्षेत्रों की पर्यावरणीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए नीतियां तैयार करने और आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है।
उन्होंने यह भी बताया कि कुछ क्षेत्रों को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) घोषित करने की दिशा में भी कदम उठाए जा रहे हैं। CEC की रिपोर्ट में हिमालयी पर्यावरण को सुरक्षित रखने और विकास गतिविधियों के बीच संतुलन कायम करने को लेकर महत्वपूर्ण सिफारिशें सामने आने की उम्मीद है।
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