हमीरपुर।
हिमाचल प्रदेश के खटारा मॉडल के संचालक सुक्खू एक आम हिमाचली भी ये बात समझता है कि जब कोई सरकार विधानसभा में बिल लाकर टैक्स, वैट बढ़ाने या सेस लगाने की बात करती है।
तो उसका सीधा मतलब है कि अब जनता को ज्यादा पैसा देना पड़ेगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब टैक्स, सेस या वैट के माध्यम से जनता पर बोझ डाला गया हो, ये तीसरी बार हुआ है।
हिमाचल में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राज्य सरकार की तरफ से की गई ₹5 रुपए की बढ़ोत्तरी आम आदमी की जेब पर हमला है, जिससे जनता की जेब पर सालाना ₹1000 करोड़ से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।
पहले दो बार में ₹10 रुपए से अधिक वैट लगाकर उनका जी नहीं भरा तो अब ₹5 रुपये सेस, यानी जनता की जेब पर प्रति लीटर कुल ₹15 रुपये का भार डालने का काम हिमाचल की कांग्रेस सरकार ने राहुल गांधी के निर्देश पर किया है।
यह सामान्य समझ की बात है कि, जब कोई सरकार विधानसभा में बिल लाकर टैक्स, वैट बढ़ाने या सेस लगाने की बात करती है, तो उसका सीधा मतलब है कि अब जनता को ज्यादा पैसा देना पड़ेगा। भाजपा के दबाव बनाने के बाद अब मुख्यमंत्री इधर-उधर बातें कर विषय को गोल-गोल घुमा रहे हैं। इनका हाल है कि चौबे बनने गए थे छब्बे, दुबे बनके लौटे।
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी का हाल ये है कि हाल ही में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष को चिट्ठी जारी करके अपने ही मंत्रियों और विधायकों का मुंह बंद कराना पड़ गया था।
आए दिन कांग्रेस के विधायक हर मोर्चे पर फेल हो चुकी कभी अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो कभी पार्टी से इस्तीफा दे देते हैं, जिससे कांग्रेस के हाथ-पाँव फूलने लगते हैं।
कांग्रेस की तमाम गारंटियाँ आज भी अधूरी हैं और जनता को ठेंगा दिखा रही हैं। कांग्रेस ने अपने चुनावी वादे पूरे करना तो दूर, भाजपा की पिछली सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को बंद करके केवल जनता को परेशान किया है।
अपनी नीतियों से हिमाचल का खजाना खाली करने और 1 लाख करोड़ से अधिक के कर्ज के दलदल में धकेलने के बाद अब प्रदेश की जनता पर टैक्स, सेस और वैट का बोझ डालकर अपने मित्रों की मौज के लिए मशहूर होना मुख्यमंत्री को शोभा नहीं देता।
अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा “जनता पर टैक्स का बोझ लाद कर सुक्खू मित्रों की मौज करा रहे हैं, चुनावी गारंटियाँ पूरी ना कर पाने वाली कांग्रेस पार्टी के बर्तन आपस में ही बज रहे हैं मगर विडंबना ये है कि प्रदेश को कर्जे के बोझ तले दबाने वाले सुक्खू कंबल ओढ़ के घी पीने में मस्त हैं।
बार-बार टैक्स, वैट या सेस के माध्यम से हो रही वसूली पर राज्य की जनता ये जानना चाहती है कि ये अतिरिक्त बढ़ोतरी का पैसा राज्य के खजाने में जाता है या इनके हाईकमान और मित्रों की जेब में।
एक राज्य सरकार जब विकास करने की जगह समोसे पर सीआईडी जांच बिठाने, टॉयलेट टैक्स की बात करने या जंगली मुर्गा परोसे जाने जैसे मुद्दों पर खबरों में आने लगे तो यही समझना चाहिए कि प्रदेश का बंटाधार हो रहा है।
क्या उन्हें इस बात की बेसिक समझ भी नहीं है कि किसी भी प्रकार का टैक्स अंततः आम उपभोक्ता पर ही पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगे होने से परिवहन, खेती-बाड़ी, ढुलाई और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर सीधा असर पड़ता है।
कांग्रेस सरकार पहले ही ईंधन पर टैक्स लगाकर जनता की जेब से हजारों करोड़ रुपये निकाल चुकी है और अब सेस के नाम पर एक और आर्थिक बोझ डालने की तैयारी कर रही है।