मंडी (हिमाचल प्रदेश): हिमाचल प्रदेश की देवभूमि में आस्था और विश्वास की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने आधुनिक युग में भी प्राचीन देव परंपराओं की शक्ति को सिद्ध कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त महर्षि पराशर के पावन दरबार में पिछले तीन दिनों से विराजमान 'परम आदि देव श्री महागणपति महाराज (देव चंडोही)' एक विशेष देव अनुष्ठान और भारी बर्फबारी के बाद अपने गंतव्य को लौट गए हैं।
हिमाचल में पिछले चार महीनों से जारी भीषण सूखे के संकट को देखते हुए महर्षि पराशर जी द्वारा ऋषि भंडार 'बांधी' से श्री महागणपति जी को 'शेष फूल' (विशेष न्यौता) भेजा गया था। ऋषि आदेशानुसार 21 जनवरी का दिन इस दिव्य मिलन के लिए निश्चित किया गया था। आज्ञा पाकर प्रभु महागणपति नीले गगन के नीचे दुर्गम रास्तों से होते हुए पराशर के दिव्य दरबार पहुंचे।
आगमन के एक दिन बीत जाने के बाद भी जब आकाश मौन रहा और वर्षा या बर्फबारी का कोई संकेत नहीं मिला, तो दरबार में उपस्थित देवलुओं और भक्तों के मन में निराशा छाने लगी। स्थिति यहाँ तक पहुंच गई कि देव रथ को बाहर निकाला गया और सभी अपने गंतव्य की ओर लौटने की तैयारी करने लगे।
किंतु तभी करुणा के सागर श्री महागणपति महाराज अडिग हो गए। देव वाणी के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि जब तक देव अनुष्ठान पूर्ण नहीं होगा, मैं वापस नहीं जाऊंगा।
इसके पश्चात महर्षि पराशर के आदेश पर दरबार में एक विशेष देव अनुष्ठान और 'महाहवन' का आयोजन करने का निर्णय लिया गया। समस्त उपस्थित जनसमूह ने सामूहिक पुकार की कि आज रात्रि किसी भी हाल में वर्षा या बर्फबारी होनी चाहिए।
भक्तों का विश्वास और देवताओं की करुणा का फल कुछ ही घंटों में देखने को मिला। जिनकी कृपा से विघ्न मार्ग छोड़ देते हैं, उन्हीं आदि देव श्री महागणपति जी की कृपा से रातों-रात पूरी पराशर घाटी ने सफेद बर्फ की चादर ओढ़ ली। आकाश ने अपने द्वार खोल दिए और धरती को दीर्घकालिक सूखे से मुक्ति मिली।
शनिवार सुबह जब चारों ओर बर्फ की चांदी नजर आई, तो भक्तों की आंखों में खुशी के आंसू थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल मौसम का बदलाव नहीं, बल्कि हमारी देव संस्कृति और आस्था का जीता-जाता प्रमाण है। विशेष अनुष्ठान और महाहवन की पूर्णाहुति के बाद, प्रकृति को नई संजीवनी देकर देव चंडोही (महागणपति) अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर गए।