मण्डी
मण्डी नगर की 500 वर्षों की गौरवशाली ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को वैज्ञानिक रूप से समझने व सहेजने के लिए एक महत्वपूर्ण संयुक्त पहल की गई है। सरदार पटेल विश्वविद्यालय (मण्डी) तथा जीवाजी विश्वविद्यालय (ग्वालियर) के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत संकाय एवं विद्यार्थी शैक्षणिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत पुरातात्त्विक
एवं ऐतिहासिक सर्वेक्षण का विधिवत शुभारम्भ हो गया है। इस विशेष शोध परियोजना के सिलसिले में जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर का एक पाँच सदस्यीय उच्च स्तरीय दल वरिष्ठ इतिहासविद् एवं पुरावेता प्रो. शांतिदेव सिसोदिया के नेतृत्व में मण्डी पहुँचा है, जहाँ विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य ललित कुमार अवस्थी ने दल का आत्मीय स्वागत किया।
इस अवसर पर कुलपति आचार्य ललित कुमार अवस्थी ने अपने संबोधन में कहा कि यह शैक्षणिक सहयोग भारतीय इतिहास एवं सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगा।
मण्डी नगर हमेशा से हिमालयी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास का एक प्रमुख केन्द्र रहा है, जिसका वैज्ञानिक प्रलेखन (Documentation) आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा।
कार्यक्रम के संयोजक एवं इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि सर्वेक्षण के पहले चरण में इस दल ने मण्डी नगर के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों जैसे त्रिलोकनाथ मंदिर, पंचवक्त्र महादेव मंदिर, भूतनाथ मंदिर, अर्धनारीश्वर मंदिर, महामृत्युंजय मंदिर और राजमहल परिसर का गहन निरीक्षण कर महत्वपूर्ण डेटा संकलित किया है।
मंदिरों की स्थापत्य शैली (Architecture) और मूर्तिकला के साथ-साथ इस दल ने नगर के प्राचीन जल स्रोतों और पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों का भी विशेष अध्ययन किया है।
ग्वालियर से आए दल के प्रमुख प्रो. शांतिदेव सिसोदिया ने कहा कि मण्डी की ऐतिहासिक धरोहरें पश्चिमी हिमालय की सांस्कृतिक निरन्तरता को बारीकी से समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं और इन तथ्यों का उपयोग भविष्य में उच्च स्तरीय शोध व विरासत संरक्षण की योजनाओं को तैयार करने में किया जाएगा।
इस ऐतिहासिक सर्वेक्षण कार्यक्रम के दौरान दोनों विश्वविद्यालयों के सहायक आचार्य, शोधार्थी और विद्यार्थी विशेष रूप से उपस्थित रहे।