आधे घंटे तक चला ड्रोन शो और लेजर लाइटिंग बना आकर्षण, 64 साल बाद दशहरा उत्सव में शामिल हुए व्यासर के तीन देवी-देवता
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में पहली बार 500 ड्रोन के माध्यम से भव्य शो आयोजित किया गया। देर शाम ऐतिहासिक ढालपुर मैदान के आसमान में ड्रोन की मदद से भगवान श्रीराम और हिमाचली संस्कृति से जुड़ी आकृतियां प्रदर्शित की गईं।
करीब आधे घंटे तक चले इस शो ने उत्सव में पहुंचे दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। वहीं, रथ मैदान में आयोजित लेजर लाइटिंग शो भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा।
आसमान में दिखाई दी रामायण की कहानी
करीब आधे घंटे तक चले ड्रोन शो में भगवान श्रीराम के वनवास से लेकर लंका दहन तक की कहानी को विभिन्न आकृतियों के माध्यम से दर्शाया गया। एक साथ 500 ड्रोन ने आसमान में अलग-अलग दृश्य उकेरे, जिनमें रामायण के प्रसंगों के साथ हिमाचली संस्कृति की झलक भी देखने को मिली।
ढालपुर मैदान के ऊपर आयोजित इस शो को देखने के लिए लोगों में खासा उत्साह रहा। आसमान में रोशनी से उभरती भगवान श्रीराम की आकृतियों और रामायण के प्रसंगों ने दर्शकों को आकर्षित किया। विदेशी पर्यटकों ने भी इस खास नजारे को अपने कैमरों में कैद किया। ड्रोन के समन्वित प्रदर्शन ने उत्सव में तकनीक और संस्कृति के अनूठे मेल को प्रस्तुत किया।
लेजर लाइटिंग शो भी रहा आकर्षण का केंद्र
ड्रोन शो के साथ रथ मैदान में आयोजित लेजर लाइटिंग शो ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। दोनों आयोजनों के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में आधुनिक तकनीक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का संगम देखने को मिला। 500 ड्रोन के जरिए रामायण के प्रसंगों और हिमाचली संस्कृति की झलक प्रस्तुत करना इस बार के उत्सव का खास आकर्षण रहा।
64 साल बाद दशहरा उत्सव में शामिल हुए व्यासर के तीन देवी-देवता
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में फाटी व्यासर, कोठी रायसन के तीन देवी-देवता 64 साल बाद शामिल हुए। इनमें देवता कुंबर दान नाग, माता फंगणी और बाबा वीरनाथ शामिल हैं।
इस बार देवी-देवताओं ने उत्सव में शामिल होने की इच्छा जताई, जिसके बाद हारियान उन्हें लाव-लश्कर के साथ जिला मुख्यालय लेकर पहुंचे। इन देवी-देवताओं के बैठने के लिए राजा की चानणी के पीछे जगह दी गई है, जहां वे टेंटों में विराजमान हैं।
देवता कुंबर दान नाग के गुर यशपाल ने बताया कि तीनों देवी-देवता 64 साल बाद दशहरा उत्सव में शामिल होने पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि पहले उत्सव में आने की परंपरा रही है, लेकिन एक दौर ऐसा आया जब देवी-देवताओं के साथ आने वाले लोगों को खर्च आदि की परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके कारण देवी-देवताओं को उत्सव में नहीं लाया जा सका।
यशपाल के अनुसार, इस बार देवी-देवताओं ने अपने गुर के माध्यम से देववाणी कर भगवान रघुनाथ की चाकरी यानी सेवा करने जाने का आदेश दिया था। उन्होंने बताया कि पूर्वजों से सुना था कि उत्सव के दौरान देवी-देवताओं के बैठने का स्थान प्रदर्शनी मैदान में मोहणी के पेड़ के नीचे हुआ करता था। इस बार उन्हें चानणी के पास जगह दी गई है, जिससे हारियान खुश हैं।
वर्ष 1962 में शामिल हुए थे देवी-देवता
देवता के कारदार ओम प्रकाश ने बताया कि इससे पहले वर्ष 1962 में उनके देवी-देवता दशहरा उत्सव में शामिल हुए थे। उस समय उनके दादा तुलू राम कारदार थे। इसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हारियान देवी-देवताओं को उत्सव में नहीं ले जा सके। हालांकि, दशहरा समिति की ओर से हर साल देवी-देवताओं को निमंत्रण मिलता रहा।
तीनों देवी-देवता हर आयोजन में जाते हैं एक साथ
तीनों देवी-देवताओं की खासियत है कि वे हर जगह एक साथ जाते हैं। गुर यशपाल के अनुसार, देवता कुंबर दान नाग और देवता वीरनाथ गौहरी के रथ बने हुए हैं, जबकि माता फुंगणी करनाल में बास करती हैं। क्षेत्र में कोई भी देव आयोजन हो या कहीं आने-जाने का अवसर, तीनों देवी-देवता एक साथ ही चलते हैं। देवता कुंबर दान नाग ठारा नागों में से एक हैं।
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