धर्म सभा में बोले संत- बाहरी दिखावा नहीं, संस्कार, करुणा और अच्छे कर्म इंसान की असली पहचान हैं
धर्म सभा में जैन संत भरत मुनि महाराज ने इंसान की पहचान और जीवन मूल्यों को लेकर महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग अक्सर किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके घर और पहनावे से करते हैं, लेकिन वास्तविक पहचान इंसान के स्वभाव और कर्मों से होती है।
मुनि श्री ने कहा कि मकान और कपड़े केवल बाहरी आवरण हैं, जबकि स्वभाव व्यक्ति के संस्कार और आचरण को दर्शाता है।
बाहरी दिखावे से नहीं बनती महानता
प्रवचन में उदाहरण देते हुए भरत मुनि महाराज ने कहा कि सोने के पिंजरे में बंद तोते की बोली नहीं बदलती और हीरे जड़े कपड़े पहनाने से भी अगर व्यक्ति के अंदर अहंकार है तो उसकी सोच नहीं बदलती।
उन्होंने कहा कि घर ईंट-पत्थर से बनाया जा सकता है और महंगे कपड़े बाजार से खरीदे जा सकते हैं, लेकिन अच्छा स्वभाव बाजार में नहीं मिलता। स्वभाव संस्कार, अच्छी संगत और साधना से विकसित होता है।
जैसा भाव, वैसा फल
भरत मुनि महाराज ने भगवान महावीर के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि "जैसा भाव, वैसा फल और जैसा स्वभाव, वैसी पहचान"।
उन्होंने कहा कि इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहां लोगों ने अपने कर्मों से पहचान बनाई। राजा हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि साधारण जीवन जीने के बावजूद सत्य के मार्ग पर चलने के कारण आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद किया जाता है।
उन्होंने कहा कि तीर्थंकरों ने राजमहल का त्याग कर तप और साधना का मार्ग अपनाया, जिससे उन्होंने पूरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई।
जैन संत ने कहा कि व्यक्ति की पहचान उसके कपड़ों या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके कर्म, व्यवहार और करुणा से होती है। उन्होंने लोगों से जीवन में अच्छे संस्कार अपनाने और अहंकार से दूर रहने का आह्वान किया।
बच्चों को राष्ट्र सेवा के लिए आगे आने का संदेश
धर्म सभा में जैन संत अचल मुनि महाराज ने भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि बच्चों को देश, समाज और राष्ट्र सेवा के कार्यों में आगे बढ़ना चाहिए, ताकि एक मजबूत और सशक्त भारत का निर्माण हो सके।
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