नई दिल्ली I
मेट्रो, हाईवे और स्मार्ट सिटी के विज्ञापनों के पीछे भारत के महानगर एक गहरे संरचनात्मक संकट से जूझ रहे हैं। यह संकट है—शहरों को अपनी सेवाओं से चलाने वाले कामगारों के लिए किफायती आवास की भारी कमी। हालिया विश्लेषण बताते हैं कि 'बढ़ता किराया' महज एक बाज़ार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि दोषपूर्ण शहरी नियोजन (Urban Planning) का सीधा परिणाम है।
भारत की शहरी आवास व्यवस्था में एक बड़ा अंतर्निहित बहिष्कार (Exclusion) दिखाई दे रहा है वर्तमान में शहरी भारत में लगभग 94 लाख घरों की कमी है, जिसके 2030 तक 3 करोड़ पहुँचने का अनुमान है।
इस कमी का 95% हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और निम्न-आय समूहों (LIG) को प्रभावित कर रहा है। भारतीय शहरों में गरीब परिवार अपनी आय का 40-50% हिस्सा केवल सिर छिपाने पर खर्च कर रहे हैं, जो कि 30% के वैश्विक मानक से कहीं अधिक है।
शहरी नियोजन की प्राथमिकताओं ने 'कृत्रिम कमी' पैदा की है। मास्टर प्लान में आवासीय भूमि के लिए सीमित आवंटन (10-15%) ने प्रमुख स्थानों पर जमीन की कीमतों को आसमान पर पहुँचा दिया है।
रोज़गार के केंद्र मुख्य शहरों में हैं, जबकि किफायती आवास को कोसों दूर उपनगरों में धकेल दिया गया है। निम्न-आय वाले श्रमिकों के लिए रोज़गार केंद्र से दूर रहने का मतलब है—अधिक परिवहन लागत और काम के घंटों का नुकसान।
एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जहाँ लाखों लोग छत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं सरकारी आंकड़ों के अनुसार शहरी भारत में लगभग 1 करोड़ घर खाली पड़े हैं। यह रियल एस्टेट क्षेत्र में अत्यधिक सट्टेबाजी और एक कुशल रेंटल मार्केट (Rental Market) के अभाव को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 'रेंट फ्रीज़' (किराया नियंत्रण) की बढ़ती मांग असल में शहरी नियोजन की विफलताओं का एक लक्षण है। किराया नियंत्रण नीतियां केवल विस्थापन को अस्थायी रूप से रोक सकती हैं, लेकिन वे मूल समस्याओं जैसे—भूमि की उच्च लागत और आपूर्ति में कमी को हल नहीं करतीं।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत को अब 'मालिकाना हक' वाले मॉडल से आगे बढ़कर सार्वजनिक और सामाजिक रेंटल आवास पर ध्यान देना होगा। औद्योगिक केंद्रों के पास वर्कर हॉस्टल, को-लिविंग मॉडल और एम्प्लॉयर-लिंक्ड आवास बनाना अनिवार्य है। शहरी नियोजन को अब आवास को सीधे रोज़गार और परिवहन के साथ जोड़ना होगा।
सवाल केवल किराए को नियंत्रित करने का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या हमारे शहर निवेश के लिए डिज़ाइन किए गए हैं या रहने के लिए? यदि शहरों की रीढ़ माने जाने वाले कामगार ही हाशिए पर रहेंगे, तो 'स्मार्ट सिटी' की परिकल्पना केवल कागजी बनकर रह जाएगी।