शिमला।
हिमाचल प्रदेश की आर्थिक सेहत को लेकर एक बेहद चिंताजनक रिपोर्ट सामने आई है। "देवभूमि" पर कर्ज का बोझ अब 1 लाख करोड़ रुपये की मनोवैज्ञानिक सीमा को पार कर गया है। स्थिति यह है कि राज्य सरकार को पुराने कर्ज की किश्तें चुकाने और हर साल उसका ब्याज भरने के लिए भी नया कर्ज लेना पड़ रहा है।
ब्याज का भारी बोझ
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, हिमाचल प्रदेश सरकार हर साल केवल 7,272 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि ब्याज (Interest) के रूप में चुका रही है। यह राशि इतनी बड़ी है कि इससे प्रदेश में कई बड़े अस्पताल, शिक्षण संस्थान या बुनियादी ढांचा परियोजनाएं तैयार की जा सकती थीं। ब्याज का यह बढ़ता ग्राफ राज्य के बजट और विकास कार्यों पर सीधा असर डाल रहा है।
10 बोर्ड और निगम 'सफेद हाथी' साबित हो रहे
सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि राज्य के कई सार्वजनिक उपक्रम भी गहरे वित्तीय संकट में हैं। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के 10 प्रमुख बोर्ड और निगम इस समय भारी घाटे में चल रहे हैं।
इनमें परिवहन, बिजली और पर्यटन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। इन निगमों का घाटा न केवल सरकार की बैलेंस शीट बिगाड़ रहा है, बल्कि इनके कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर भी तलवार लटकी रहती है।
विकास कार्यों पर संकट के बादल
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कर्ज लेने की यही रफ्तार रही, तो आने वाले समय में राज्य के पास विकास कार्यों के लिए बहुत कम बजट बचेगा। वेतन, पेंशन और कर्ज के ब्याज का भुगतान ही राजस्व का एक बड़ा हिस्सा डकार रहा है।
विपक्ष हमलावर, सरकार के सामने चुनौती
इस वित्तीय संकट ने प्रदेश की राजनीति को भी गरमा दिया है। विपक्ष इसे सरकार की "कुप्रबंधन और फिजूलखर्ची" का नतीजा बता रहा है, जबकि वर्तमान सरकार पिछली सरकारों की देनदारियों और केंद्र से मिलने वाली मदद में कटौती को इसका मुख्य कारण मान रही है।