शिमला।
देवभूमि हिमाचल प्रदेश वर्तमान में एक अभूतपूर्व आर्थिक तंगहाली का सामना कर रहा है। राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति इतनी नाजुक हो गई है कि एक ओर जहाँ कर्मचारियों के वेतन और भत्ते समय पर देना चुनौती बन गया है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश भर में हजारों विकास परियोजनाएं बजट के अभाव में दम तोड़ रही हैं।
हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री और मंत्रियों द्वारा जिन योजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन बड़े जोर-शोर से किए गए थे, उनमें से कई पर आज तक काम शुरू नहीं हो पाया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 11,064 विकास कार्य ऐसे हैं जिनके लिए बजट स्वीकृत होने के बावजूद काम शुरू ही नहीं हो सका। कुल 27,898 ग्रामीण विकास कार्य अभी भी लंबित हैं। इनमें हैंडपंप लगाने, छोटी सड़कें बनाने, पुलियों और सामुदायिक भवनों जैसे बुनियादी कार्य शामिल हैं, जो जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं।
आर्थिक संकट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार ने हाल ही में कड़े कदम उठाए हैं। बोर्डों और निगमों के 50 से अधिक अध्यक्षों और उपाध्यक्षों से 'कैबिनेट रैंक' की सुविधाएं वापस ले ली गई हैं।
मुख्यमंत्री और मंत्रियों सहित कई शीर्ष पदों के वेतन का 20% हिस्सा अगले छह महीनों के लिए टाल (defer) दिया गया है। कई क्षेत्रों में विधायक निधि की तीसरी किस्त जारी करने में असमर्थता जताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र सरकार से मिलने वाले 'राजस्व घाटा अनुदान' (RDG) में कटौती और पुराने कर्ज के भारी ब्याज ने राज्य की कमर तोड़ दी है। राज्य का राजकोषीय घाटा GSDP का 4.74% तक पहुँचने का अनुमान है। पर्यटन और बागवानी, जो राज्य की आय के मुख्य स्रोत थे, वे भी प्राकृतिक आपदाओं के कारण पिछले कुछ समय से प्रभावित रहे हैं।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनावी गारंटियों को पूरा करने के चक्कर में खजाना खाली कर चुकी है, जिससे नई विकास योजनाएं सिर्फ कागजों और शिलापट्टों तक सीमित रह गई हैं। वहीं, मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि सरकार व्यवस्था परिवर्तन के दौर से गुजर रही है और कड़े फैसले लेकर राज्य को 'आत्मनिर्भर' बनाने की कोशिश की जा रही है।