शिमला।
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के पूर्व विधायकों को एक बड़ी राहत देते हुए उनकी पेंशन रोकने के सरकारी फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है। न्यायालय का यह आदेश प्रदेश की राजनीति और पूर्व जन-प्रतिनिधियों के वित्तीय अधिकारों के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में लिए गए उस निर्णय से जुड़ा है, जिसके तहत वित्तीय अनुशासन और संसाधनों के प्रबंधन का हवाला देते हुए पूर्व विधायकों की पेंशन में कटौती या उसे रोकने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। सरकार के इस कदम को पूर्व विधायक संघ और कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी।
न्यायालय की मुख्य कार्यवाही
याचिका पर सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीशों की खंडपीठ ने प्राथमिक दृष्टि में पाया कि पेंशन का अधिकार कानूनी प्रावधानों के तहत आता है। कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
अदालत ने सरकार के उस आदेश के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगा दी है जिसके माध्यम से पेंशन भुगतान को बाधित किया गया था। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई तक पूर्व विधायकों को मिलने वाली पेंशन की स्थिति वैसी ही बनी रहे जैसी पहले थी।
हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर इस मामले पर विस्तृत शपथ पत्र दाखिल करने को कहा है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि किन कानूनी आधारों पर पेंशन रोकने का निर्णय लिया गया था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि पूर्व विधायकों की पेंशन एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है, जिसे केवल विधायी संशोधन के माध्यम से ही बदला जा सकता है। प्रशासनिक आदेशों के जरिए इस प्रकार की कटौती करना असंवैधानिक है।
क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद अब प्रदेश के उन सभी पूर्व विधायकों को पेंशन का लाभ मिलता रहेगा जिनकी पेंशन पर सरकारी आदेश की तलवार लटक रही थी। अब सबकी नजरें कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ सरकार अपना पक्ष रखेगी।