शिमला: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में मंगलवार को 67वें तिब्बती राष्ट्रीय जनक्रांति दिवस के अवसर पर तिब्बती समुदाय ने चीन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान शेर-ए-पंजाब से लेकर डीसी ऑफिस तक आक्रोश रैली निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में तिब्बती समुदाय के लोगों के साथ-साथ विदेशियों ने भी भाग लिया।
रैली के बाद कार्यक्रम की शुरुआत तिब्बत और भारत के राष्ट्रगान के साथ की गई। इस अवसर पर तिब्बत की आजादी के लिए आत्मदाह करने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी की गई।
तिब्बतियन वुमेन एसोसिएशन और तिब्बतियन यूथ कांग्रेस सहित विभिन्न तिब्बती गैर-सरकारी संगठनों द्वारा आयोजित इस प्रदर्शन के दौरान प्रतिनिधियों ने तिब्बत की आजादी की मांग उठाई। उन्होंने कहा कि तिब्बत की स्वतंत्रता केवल तिब्बती लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है।
निर्वासित तिब्बती प्रतिनिधियों ने इस दौरान चीन सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और संयुक्त राष्ट्र से न्याय दिलाने की मांग की। साथ ही विश्व समुदाय से तिब्बत के स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग करने की अपील भी की गई।
1959 में हुआ था बड़ा विद्रोह
10 मार्च 1959 को तिब्बत की राजधानी ल्हासा में चीन के कब्जे के खिलाफ बड़ा विद्रोह हुआ था। उस समय हजारों तिब्बती लोग अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर आए थे। दलाई लामा की सुरक्षा के लिए हजारों लोगों ने पोटाला पैलेस को घेर लिया था।
बताया जाता है कि चीन की पीपुल्स रिपब्लिक आर्मी (PLA) ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए बेहद कठोर कार्रवाई की, जिसमें हजारों तिब्बती मारे गए। हालात बिगड़ने के बाद दलाई लामा को तिब्बत छोड़कर भारत में शरण लेनी पड़ी।
तभी से हर साल 10 मार्च को दुनिया भर में तिब्बती समुदाय और उनके समर्थक तिब्बती राष्ट्रीय जनक्रांति दिवस के रूप में इस दिन को मनाते हुए चीन की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं।