हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ औद्योगिक क्षेत्र के झिड़ीवाला गांव में टायरों के पेंचर बनाने वाली यूनिपेच और रबड़ बनाने वाली फैक्ट्री से होने वाले जल और वायु प्रदूषण ने ग्रामीणों का जीना मुहाल कर दिया है।
इन फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले रसायनों और प्रदूषित पानी के कारण गांव में कैंसर, बीपी, शुगर, किडनी फेल जैसी गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि एक दर्जन से अधिक लोग इन बीमारियों की चपेट में हैं, और कई परिवार इलाज के लिए आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
गुस्साए ग्रामीणों ने फैक्ट्रियों के गेट पर एकत्र होकर जोरदार प्रदर्शन किया और कंपनी प्रबंधन के खिलाफ नारेबाजी की, लेकिन उनकी शिकायतों का कोई समाधान नहीं निकला। प्रदर्शन के दौरान यूनिपेच कंपनी के एचआर मैनेजर अशोक कुमार ग्रामीणों से मिलने पहुंचे, लेकिन प्रदूषण के सवालों पर स्पष्ट जवाब देने के बजाय उन्होंने पल्ला झाड़ लिया।
उन्होंने दावा किया कि कंपनी के पास प्रदूषण से संबंधित सभी दस्तावेज पूरे हैं और कोई समस्या होने पर प्रबंधन खुद देखेगा। ग्रामीणों ने इसे गैर-जिम्मेदाराना रवैया बताते हुए कंपनी प्रबंधन और हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एचपीपीसीबी) पर मिलीभगत और घूसखोरी के गंभीर आरोप लगाए।
उनका कहना है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद बोर्ड ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की, जिससे उनका विश्वास प्रशासन पर से उठता जा रहा है। स्थानीय निवासियों ने बताया कि प्रदूषण के कारण गांव का पर्यावरण पूरी तरह दूषित हो चुका है।
जहरीले पानी और हवा ने न केवल मानव जीवन को खतरे में डाला है, बल्कि खेती और पशुपालन पर भी बुरा असर पड़ा है। एक कैंसर पीड़ित महिला ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि वह पहले स्वस्थ थीं, लेकिन फैक्ट्रियों के प्रदूषण के कारण उन्हें सांस लेने में तकलीफ और दौरे पड़ने लगे।
पीजीआई चंडीगढ़ में जांच के बाद उन्हें कैंसर का पता चला। डॉक्टरों ने बताया कि प्रदूषित क्षेत्र में रहने से उनकी जान को और खतरा है, और ऑपरेशन के बावजूद 80% मृत्यु की संभावना है।
उन्होंने कहा, “हमने कंपनी और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कई बार गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अब हाई कोर्ट ही हमारा सहारा है।ग्रामीणों का गुस्सा और उनकी हाई कोर्ट जाने की चेतावनी सरकार और प्रशासन के लिए एक बड़ा अलार्म है।
अब देखना यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सरकार इस मामले में कितनी तत्परता दिखाती है और क्या ग्रामीणों को इस प्रदूषण के कहर से निजात मिल पाती है, या फिर उन्हें अपने हक के लिए अदालत की शरण लेनी पड़ेगी। यह मुद्दा नालागढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ एक बड़ी लड़ाई का प्रतीक बन सकता है।