सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इच्छामृत्यु से जुड़े एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए 13 साल से कोमा में पड़े 31 वर्षीय हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, ने एम्स (ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) को निर्देश दिया कि हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को धीरे-धीरे और चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया पूरी तरह मरीज की गरिमा और सम्मान को ध्यान में रखते हुए की जानी चाहिए। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा लंबे समय से लाइफ सपोर्ट पर हैं और इस मामले को देश में इच्छामृत्यु के क्षेत्र में पहला मानक मामला माना जा रहा है।
हरीश के माता-पिता, निर्मला राणा और अशोक राणा ने अपने बेटे की हालत को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में इस अनुमति के लिए याचिका दायर की थी। परिवार ने अदालत को बताया कि हरीश के इलाज में उन्होंने अपनी संपत्ति तक बेच दी और लंबे समय तक बेटे की लगातार पीड़ा और आर्थिक बोझ उठाना उनके लिए अत्यंत कठिन हो गया है।
हरीश राणा दिल्ली में जन्मे थे और चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। वर्ष 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए, जिससे उनके पूरे शरीर में लकवा मार गया और वे कोमा में चले गए। तब से वह न बोल सकते हैं, न प्रतिक्रिया दे सकते हैं और पूरी तरह वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब पर निर्भर हैं।
डॉक्टरों के अनुसार हरीश क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं, जिसमें मरीज का पूरा शरीर लकवा ग्रस्त हो जाता है और सामान्य जीवन की कोई संभावना नहीं रहती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े रहने के कारण उनके शरीर पर घाव बन गए हैं और उनकी शारीरिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे मामलों में केवल चिकित्सा दृष्टि ही नहीं बल्कि मरीज के सर्वोत्तम हित और गरिमा को भी ध्यान में रखना अनिवार्य है। अदालत ने यह भी कहा कि डॉक्टर का कर्तव्य है कि वे इलाज करें, लेकिन जब मरीज के ठीक होने की संभावना न हो, तो परिस्थितियां अलग हो जाती हैं और जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अमेरिकी धर्मगुरु हेनरी वार्ड बीचर के शब्दों का हवाला देते हुए कहा कि ईश्वर मनुष्य से यह नहीं पूछते कि वह जीवन स्वीकार करता है या नहीं, बल्कि इसे जीना ही पड़ता है।
अदालत ने विलियम शेक्सपीयर के नाटक “हैमलेट” की पंक्ति “To be or not to be” का भी उल्लेख किया, यह बताते हुए कि कभी-कभी न्यायालयों को जीवन और मृत्यु के अधिकार जैसे गंभीर सवालों पर विचार करना पड़ता है।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि पैसिव यूथेनेशिया के लिए स्पष्ट कानून बनाना आवश्यक है, क्योंकि फिलहाल यह केवल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों और दो मेडिकल बोर्ड की राय पर निर्भर करता है।
कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता जताई कि मरीज के जीवन के अंतिम दिनों में किसी भी प्रकार की अनावश्यक पीड़ा न हो और निर्णय पूरी तरह से चिकित्सकीय और नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित हो।
हरीश के पिता अशोक राणा ने कहा कि यह निर्णय उनके लिए भावनात्मक रूप से कठिन था, लेकिन बेटे की लगातार पीड़ा और हालत को देखकर यह कदम उठाना जरूरी था। उन्होंने कहा कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चे के लिए ऐसी स्थिति नहीं चाहते, लेकिन बेटे की गरिमा और जीवन की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए यह फैसला लेना पड़ा।
इस फैसले को चिकित्सकीय, कानूनी और सामाजिक दृष्टि से ऐतिहासिक माना जा रहा है और यह इच्छामृत्यु के विषय में भारत में मार्गदर्शक बन सकता है।